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August 16, 2018

India: Terror attacks foiled in Maharashtra - Arrests of activists of Hindutva far-right groups (URLs to reports)

Terror attacks foiled, 3 with links to hardline Hindu groups held: Maharashtra ATS https://indianexpress.com/article/india/terror-attacks-foiled-3-with-links-to-hardline-hindu-groups-held-maharashtra-ats-5301186/

Explosives, Literature Seized From Right-Wing Activist's Maharashtra Home (NDTV, Aug 10, 2018)
https://www.ndtv.com/cities/anti-terror-squad-seizes-explosives-from-maharashtras-nallasopara-accused-arrested-1898322

Maharashtra ATS seizes 10 pistols from home of key terror accused (Indian Express, Aug 13, 2018)
https://indianexpress.com/article/india/maharashtra-ats-seizes-10-pistols-from-home-of-key-terror-accused-5303617/

Hindi Article-Ramvilas Pasawan, BJP and Dalit poltics


आज किस पार्टी को फ़िक्र है दलितों की? राम पुनियानी अत्याचार निवारण अधिनियम में अग्रिम जमानत का प्रावधान कर उसे कमज़ोर करने के प्रयास का देश-व्यापी विरोध हुआ. विरोध प्रदर्शनों का मूल स्वर यह था कि भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार दलित-विरोधी है. बढ़ते विरोध के मद्देनज़र, सरकार को एक विधेयक के जरिये इस अधिनियम में संशोधन करना पड़ा. गत 6 अगस्त को लोकसभा ने सर्वसम्मति से ‘अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम 2018’ पारित कर दिया. इस अधिनियम द्वारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किये गए परिवर्तनों को शून्य कर दिया गया है और अब पूर्ववत, दलितों अथवा आदिवासियों पर अत्याचार के आरोपी, अग्रिम जमानत की अर्जी प्रस्तुत नहीं कर सकेंगे. विधेयक पर हुए चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान, जो कि एनडीए का हिस्सा हैं, ने प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए कांग्रेस की निंदा की. कांग्रेस को दलित-विरोधी सिद्ध करने के लिए पासवान ने यह तर्क भी दिया कि कांग्रेस ने चुनाव में आंबेडकर के खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा किया था. पासवान की आंबेडकर की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता संदेह के घेरे में है. वे इस समय एक ऐसी पार्टी के साथ खड़े हैं, जिसका एजेंडा है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण. सामाजिक न्याय, प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के हामी आंबेडकर के जीवन और विचारों में हिन्दू राष्ट्र के लिए कोई जगह नहीं थी. पासवान घोर अवसरवादी राजनेता हैं और सत्ता में बने रहने के लिए पलटी खाने में उनका कोई जवाब नहीं है. वे किसी विचारधारा के खूंटे से बंधे नहीं हैं. सत्ता ही उनकी विचारधारा है और सत्ता ही उनका लक्ष्य है. सत्ता पाकर वे स्वयं को धन्य महसूस करते हैं. जहाँ तक कांग्रेस द्वारा आंबेडकर के खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा करने का प्रश्न है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आंबेडकर कभी भी कांग्रेस के सदस्य नहीं थे. और ना ही हमें यह भूलना चाहिए कि इसके बावजूद भी कांग्रेस ने उन्हें अपने पहले मंत्रिमंडल में शामिल लिया और उन्हें संविधान सभा की मसविदा समिति का अध्यक्ष भी बनाया. यही नहीं, उन्हें हिन्दू कोड बिल तैयार करने की ज़िम्मेदारी भी दी गयी थी. यह बिल पारिवारिक कानूनों में संशोधन कर उन्हें लैंगिक दृष्टि से न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था. क्या कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व की मर्ज़ी के बिना यह सब हो सकता था? पासवान जैसे सत्ता के लोभियों, जो आंबेडकर के नाम की माला जपते रहते हैं, को क्या यह याद नहीं है कि आंबेडकर द्वारा तैयार किये गए संविधान और हिन्दू कोड बिल के सबसे कटु आलोचक और विरोधी वे लोग थे, जिनके राजनैतिक उत्तराधिकारियों की गोद में पासवान बैठे हैं? भाजपा की हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, बाबासाहेब के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों की धुर विरोधी है. हिन्दू राष्ट्र न तो धर्मनिरपेक्ष होगा और ना ही प्रजातान्त्रिक - और धर्मनिरपेक्षता व प्रजातंत्र आंबेडकर को बहुत प्रिय थे. आरएसएस ने भारतीय संविधान को पश्चिमी बताते हुए उसकी कड़ी आलोचना की थी. भाजपा ने संघ और उसके हिन्दू राष्ट्रवाद से अपना नाता कभी नहीं तोड़ा. सन 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान, नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि चूँकि उनका जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था और चूँकि वे राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं. केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने कहा था कि भाजपा, भारतीय संविधान को बदलेगी. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धर्मनिरपेक्षता को स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा झूठ बताया था. जहाँ तक दलितों का प्रश्न है, भाजपा एक नाज़ुक संतुलन बना कर चल रही है. पासवान, उदित राज और रामदास अठावले जैसे कुछ दलित नेताओं की सत्ता की भूख का लाभ उठा कर पार्टी उनका उपयोग दलितों में अपनी पैठ बनाने के लिए और अपना आप को दलितों का शुभचिंतक बताने के लिए कर रही है. दूसरी ओर, आदित्यनाथ और हेगड़े जैसे लोगों को पार्टी का दूसरा चेहरा जनता के सामने रखने की छूट भी मिली हुई है. वोटों के खेल में जीतने के लिए भाजपा अपने से विरोधी विचारधारा वाले आंबेडकर की शान में कसीदे भी काढ़ रही है. ज़मीनी स्तर पर, भाजपा-एनडीए, जिसके पासवान सदस्य हैं, ने दलितों का जीना हराम कर दिया है. सुहेल देव और शबरी माता जैसे काल्पनिक नायकों के सहारे भाजपा दलितों के एक हिस्से को अपने साथ लाने के कोशिश कर रही है. परन्तु इस सोशल इंजीनियरिंग के समानांतर, दलितों को दबाने-कुचलने की राजनीति भी जारी है. ऊना में दलितों के साथ जो कुछ हुआ, उसे पासवान ने एक मामूली घटना बता कर टाल दिया. परन्तु क्या यह सच नहीं है कि गौ माता के मुद्दे के जोर पकड़ने के कारण, दलितों के एक तबके की रोजीरोटी परर गंभीर विपरीत प्रभाव पड़ा है? इसी सरकार के कार्यकाल में रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या हुई और भीमा कोरेगांव की घटना भी. मोदी सरकार ने अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधन भी भारी दबाव के चलते किया. अगर तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव नज़दीक नहीं होते और अधिनियम को कमज़ोर किये जाने का इतना कड़ा विरोध नहीं हुआ होता तो शायद सरकार अब भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहती. भाजपा आंबेडकर कर यशोगान करती है परन्तु भगवान राम उसकी राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. हम सब जानते हैं कि आंबेडकर राम के बारे में क्या सोचते थे. ‘रिडल्स ऑफ़ हिंदूइस्म’ में उन्होंने राम के चरित्र का विश्लेषण किया है. भाजपा, आंबेडकर के चित्रों पर माल्यार्पण तो करना चाहती है, परन्तु सामाजिक न्याय के उनके सपने को पूरा करने में उसकी कोई रूचि नहीं है. कांग्रेस और आंबेडकर के बीच चुनावी लड़ाई की चर्चा, राष्ट्रीय आन्दोलन, और विशेषकर महात्मा गाँधी और कांग्रेस, की अछूत प्रथा के विरुद्ध लड़ाई के महत्व को कम कर प्रस्तुत करने का प्रयास है. जहाँ तक आंबेडकर के सपनों को पूरा करने का सवाल है, इसके लिए हमें अभी मीलों चलना है. परन्तु जैसा कि आंबेडकर स्वयं भी कहते थे, हिन्दू राज दलितों के लिए कहर से कम न होगा. परन्तु हम पासवान और उनके जैसे अन्यों से यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वे आंबेडकर की विचारधारा के अपने आंकलन पर पुनर्विचार करेंगे और यह समझेंगे कि भाजपा-आरएसएस के साथ जुड़ कर उन्होंने महती भूल की है क्योंकि भाजपा-आरएसएस का एजेंडा मूलतः दलित-विरोधी है. (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

August 15, 2018

India: Hindu Mahasabha sets up first Hindu court on the lines of Shariat court

The Times of India

This I-Day, Hindu Mahasabha sets up first Hindu court on the lines of Shariat court
TNN | Aug 15, 2018, 04.33 PM IST

This I-Day, Hindu Mahasabha sets up first Hindu court on the lines of Shariat court
MEERUT: In a first of its kind move, the members of Akhil Bharatiya Hindu Mahasabha set up the first Hindu court – on the lines of Shariat court, as the country celebrated Independence Day on Wednesday. Set up with an aim to make decisions on Hindu affairs, and have an equivalent court-like system in place just like Darul Qaza (Shariat courts) – which resolves issues in line with Islamic Laws, the first Hindu Court also got its first judge in a ceremony that was held here at the party’s office on Meerut’s Sharda road.

“We had challenged the establishment of Shariat Courts a few days ago and asked that they should not exist at all because there should be one constitution for all. We had even asked the government in a letter that we sent demanding this, that if our demands are not met, we will set up a similar court for Hindus. Since no action was taken in our favour, we set up the first Hindu court here on Wednesday,” said Pandit Ashok Sharma, national vice president, Akhil Bharatiya Hindu Mahasabha. Sharma is also the head of the five-member sangrakshak mandalof the Hindu court.

Pooja Shakun Pandey, national secretary, Akhil Bharatiya Hindu Mahasabha, who has been appointed as the first judge of the Hindu Court, said, “We will deal with matters related to Hindus only and the issues will range from harassment of Hindu women, Hindu marriages, disputes of property or money, and many others. When the BJP came to power in the centre and the state, we had high hopes from them but since they have started playing divide and rule among Hindus on the basis of caste, Hindu court is a way to bring them together. We will have proper jails and our maximum punishment will be death.” Pandey, it should be noted, was a professor until five years ago and has masters in Maths, Computer Science, and also is an M.Phil in Mathematics and Ph.D in Mathematics.

The party members plan to declare the bylaws of their court on October 2 and appoint a total of five judges in different parts of the country on November 15, so that “Hindus can get justice at five different places,” said Shrma.

Abhishek Agarwal, district president, Hindu Mahasabha, said, “The civil courts already have lakhs of pending cases and it gets difficult to get justice for a person who is poor. So by means of the Hindu court, people will be able to get quick and affordable justice.”

August 09, 2018

Hindi Article-Assam NRC


क्या असम के प्रवासी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं? राम पुनियानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का पहला मसौदा जारी होते ही पूरे देश में बवाल उठ खड़ा हुआ है। इस सूची से असम में रह रहे लगभग 40 लाख लोगों के नाम गायब हैं। शासक दल भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि जिन लोगों के नाम एनआरसी में नहीं हैं, वे घुसपैठिये हैं, देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, इन लोगों के कारण राज्य के संसाधनों पर बहुत दबाव पड़ रहा है और राज्य के मूल नागरिक कष्ट भोग रहे हैं। अपीलों के निराकरण के बाद, एनआरसी का अंतिम मसौदा प्रकाशित होगा और जिन लोगों के नाम इसमें नहीं होंगे, उन पर अनिश्चितता की तलवार लटकने लगेगी। सामान्य समझ यह है कि जिन लोगों के नाम एनआरसी में नहीं हैं, वे बांग्लादेशी मुसलमान हैं। शाह के निशाने पर भी मूलतः यही लोग हैं। यह प्रचार भी किया जा रहा है कि ये लोग संसाधनों पर बोझ और सुरक्षा के लिए खतरा होने के अतिरिक्त, राज्य के भाषायी और नस्लीय स्वरुप को बदल रहे हैं। तथ्य यह है कि जिन लोगों के नाम इस सूची में नहीं हैं, उनमें कई समुदाय के व्यक्ति शामिल हैं। ऐसी खबरें हैं कि इनमें भारी संख्या में हिन्दू हैं और पश्चिम बंगाल व नेपाल आदि के रहवासी भी। यह दिलचस्प है कि एनआरसी ने कई परिवारों को बिखेर दिया है। ऐसे अनेक परिवार हैं, जिनके कुछ सदस्यों के नाम इसमें शामिल हैं और कुछ के नहीं। इससे छूट गए लोगों में असुरक्षा और भय का भाव जागना स्वाभाविक है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एनआरसी के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजा दिया है। यह मांग भी उठ रही है कि देश के अन्य भागों के लिए भी एनआरसी बनाया जाना चाहिए। नस्लीय और भाषायी मसलों को अगर हम छोड़ भी दें, तो सांप्रदायिक ताकतें लम्बे समय से बांग्लादेशी प्रवासियों का मुद्दा उठाती आ रहीं हैं। मुंबई में सन 1992-93 के दंगों के बाद भी यह मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया गया था। दिल्ली में भी कई मौकों पर यह मुद्दा उठाया जाता रहा है। हाल में दिल्ली में रोहिंग्या मुसलमानों की एक बस्ती को आग के हवाले कर दिया गया। मूल मुद्दा असम के नस्लीय और धार्मिक चरित्र में बदलाव का है। इसके कई राजनैतिक और ऐतिहासिक कारण हैं। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश शासकों ने 'मानव रोपण' कार्यक्रम शुरू किया जिसके अंतर्गत अधिक जनसँख्या वाले बंगाल से लोगों को असम में बसने के लिए प्रोत्साहित किया जाना था। इस कार्यक्रम के दो उद्देश्य थे: बंगाल पर तेजी से बढ़ती जनसँख्या का दबाव काम करना और असम की खाली पड़ी ज़मीन पर खेती शुरू कर, अनाज का उत्पादन बढ़ाना। इस कार्यक्रम के अंतर्गत बंगाल के जो रहवासी असम में बसे, उनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल थे। आज़ादी के समय भी असम की मुस्लिम जनसँख्या इतनी अधिक थी क़ि जिन्ना ने यह मांग की थी कि असम को पाकिस्तान का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बाद में, पाकिस्तानी सेना द्वारा पूर्व पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में प्रारम्भ किये गए कत्लेआम के कारण, बड़ी संख्या में इस इलाके में रह रहे लोग असम में आ बसे। सेना के दमन से बचने के लिए उनके पास इसके अतिरिक्त कोई रास्ता भी नहीं था। बांग्लादेश के निर्माण के बाद, वहां की गंभीर आर्थिक स्थिति के चलते, कुछ लोग आर्थिक कारणों से असम में बस गए। एनआरसी कुछ दस्तावेजों के आधार पर तैयार किया गया है। क्या यह संभव नहीं है कि कुछ वैध नागरिकों के पास ये दस्तावेज न हों और कुछ अवैध नागरिकों ने नकली दस्तावेज बना लिए हों? जहाँ तक इस आरोप का प्रश्न है कि वोट बैंक राजनीति की खातिर देश में अवैध प्रवेश को बढ़ावा दिया गया, इसमें अधिक से अधिक आंशिक सत्यता ही हो सकती है। लोग केवल बाध्यकारी परिस्थितियों में दूसरे देश में अवैध प्रवासी के रूप में बसते हैं। आखिर यह उनके पूरे जीवन का प्रश्न होता है। ये लोग भी ईश्वर की संतान हैं और इस क्रूर दुनिया में किसी तरह अपनी ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहाँ कि कुबेर, धन के बदले नागरिकता खरीद सकते हैं। और ना ही हमें यह भूलना चाहिए की हमारे देश के कई नागरिक, जनता की गाढ़ी कमाई का धन लूट कर विदेशों में चैन की बंसी बजा रहा हैं। क्या गरीबों के लिए इस दुनिया में कोई जगह ही नहीं है? यह सही है कि असम में भारी गड़बड़ियां हुई हैं। परन्तु वहां जो कुछ हुआ, उसके लिए केवल बांग्लादेश से वहां बस गए मुसलमानों को दोषी ठहरना और उन्हें देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताना ठीक नहीं है। पूर्व सरकारों ने भी कई ऐसे लोगों को निर्वासित किया है। ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाये जो सबसे निचले दर्जे के काम करके अपना पेट पाल रहे हैं? हमारे देश में सामाजिक सुरक्षा कवच तो है नहीं कि उससे लाभ उठाने के लालच में लोग यहाँ बस जाएं। हम सब देख रहे हैं कि किस प्रकार 'देश-विहीन' रोहिंग्या मुसलमानों को विभिन्न देशों में पटका जा रहा है। सांप्रदायिक तत्त्व रोहिंग्याओं को भी खतरा बता रहे हैं और सभी बांग्ला-भाषी मुसलमानों और हिन्दुओं को बांग्लादेशी। अब तक भारत एक बड़े दिल वाला देश रहा है। हमने कभी शरणागत को नहीं ठुकराया। हमने तमिल-भाषी श्रीलंका निवासियों को गले लगाया और तिब्बत के बौद्धों को सम्मान से रखा। अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओं को शरणार्थी और मुसलमानों को घुसपैठिया बताना अमानवीय है। अगर एनआरसी का अंतिम मसौदा तैयार भी हो गया तो इससे हमें क्या हासिल होगा? वतर्मान में बांग्लादेश के सामाजिक-आर्थिक सूचकांक भारत से बेहतर हैं। बांग्लादेश पहले से ही यह कह चुका है कि असम में रह रहे प्रवासी उसके नागरिक नहीं हैं और वह उनका देश-प्रत्यावर्तन स्वीकार नहीं करेगा। फिर हम, ऐसे लोगों, जिनके पास कुछ दस्तावेज नहीं हैं, को चिन्हित कर क्या करेंगे? क्या हम उन्हें शिविरों में कैद कर देंगे? वर्तमान में वे निचले दर्जे के काम कर अपनी रोज़ी- रोटी चला रहे हैं। आखिर इस पूरी कवायद से हमें मिलेगा क्या? यही कवायद देश के अन्य राज्यों में करने की मांग अर्थहीन है। आज ज़रूरी है कि हम इन लोगों के प्रति उसी तरह का करुणा भाव रखें जो हमने तमिल और बौद्ध शरणर्थियों के प्रति रखा था। विभाजन के बाद से भारत की जनसँख्या के स्वरुप में भारी परिवर्तन आया है और इसका कारण है आर्थिक व अन्य कारणों से हुआ प्रवास। हमारा यह दावा है कि हम वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन में विश्वास रखते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि केवल वे ही नीतियां सफल होँगी जो करुणा और सहृदयता पर आधारित हों। हमें समाज के कमज़ोर वर्गों के प्रति सहानुभूति रखनी ही होगी। ऐसे वर्गों को सुरक्षा के लिए खतरा मानना अनुचित होगा। हमें मददगार और उदार ह्रदय बनना होगा। समावेशिता के अलावा कोई रास्ता नहीं है। (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

August 05, 2018

Rising Hate and Violence: What should Minorities do?


Countering Hate and Violence: What Should Minorities Do? Ram Puniyani The violence against religious minorities has been on the rise during last few years. Many a reports tell us not only about the overall rise in the violence but also about the portents of violence orchestrated in the name of Mother Cow and nationalism in recent times. It has increased the insecurity among the religious minorities to no end; leading to ghettotization, which has started affecting the social fabric in very adverse way. It is in this background that the efforts of Jamiat-e-Ulama Hind to start youth clubs for self defense have to be seen and assessed whether this is the right step? Maulana Mahmood Madani, the chief of the organization while telling about the efforts of his organizations gave an outline of the things to come. As per him the motto of the initiative is “to make youths capable of dealing with tough situations and help the country whenever there is a situation of crisis. He said that the outfit will provide training to the youths just like the Scouts and Guides.” Reacting to this the likes of Vinay Katiyar and spokesmen of RSS related organizations said that this may promote violence and that this is an attempt to copy RSS model, but it will not work. While Madani focused on the training like that of Boys Scouts and Guides, the self defense logic may lead it to an unwanted direction. Many a spokesmen from Muslim organizations have opposed this step of Jamiat by saying that Muslims have full faith in justice system and that giving safety and security to the citizens is the duty of the state. It’s undeniable that the feeling of insecurity among the Muslim and Christian community has seen an unprecedented rise; with the coming of Modi Sarkar to power. As such it has been RSS and its progeny which introduced the training in wielding lathi (baton), guns in a systematic way. RSS shakhas began with lathis in their shakhas. The question is that time the major problem of Indian society was with the British rule. Could they have used lathis against British? No way! It was primarily for the use within the society itself. From last few decades the Bajrang Dal and Durga Vahini have been given training in guns as well. All this has been done in the name of self defense! What comes to one’s mind is that in post independence period we have the rule of law with Indian Constitution as the fulcrum of our values. Here we have police, judiciary for protection and justice. So what justifies the program of RSS combine in so called arms training? RSS is very fascinated with arms and every Dusshera day they worship armaments. They have an exhibition of armaments. There are reports doubting whether the police have information about these armaments with RSS, while they do hold license for that. While talking of non violence; RSS has glorified the arms and indulged in training the young boys and girls in these weapons. On the top of this RSS affiliates have undertaken Trishul (trident) distributions. These trishuls, which have been distributed times and over again; have contributed to rise in hate sentiments. Trishul has religiosity associated with Lord Shiva and is blunt; while the trishuls distributed by these groups have sharp edges like knife. Legal positions apart; such ‘self defense’ organized by communities is a negative phenomenon. Dilemmas of Muslim community and organizations like Jamiat are well taken. What should be the role of minority organizations in such troubled times? There are Muslim organizations which are opposing Jamiat’s move. Community’s plight cannot be saved by training some youths in techniques of scouts and guide, neither in copying the methods of RSS combine. What is needed is to call for proper implementation of justice and policing mechanism. Most of the communal violence reports tell us about the partisan attitude of the police and the lax attitude of political parties is the main reason for violence going up and up. Justice has not been delivered in 1984 anti-Sikh massacre; it might have given the major boost to the culture of impunity. In Mumbai Sri Kirshna Commission report was not implemented, boosting the trend of where criminal can get away, innocents suffer and justice is denied. In Gujarat violence, post Godhra, which took place right under the nose of the most efficient chief minster; nearly two thousand Hindus and Muslims were done to death, while state was accomplice in the violence. The Jamiat leadership should think whether they are going in the right direction. Good intentions alone are not enough. Let’s identify the core cause of violence. It’s the Hate manufactured in society. Hate in turn has peaked to mountainous heights due to the misconceptions about the minority community enhanced lately due to abuse of social media in a systematic and planned way. Islam has been demonized as violent religion and Christians are looked down as converters. In Gujarat the travails of the likes of Teesta Setalvad, foremost human rights activist, tell us that getting justice is a humongous task. The need to counter the divisive propaganda done by our TV channels, done through section of media and spruced up by social media needs to be countered. The perceptions about our medieval period, freedom movement and all inclusive nature of Indian nationalism need to be taken far and wide. What is needed is a broad alliance of those concerned about the security and protection of human rights of all. Right to life has lately been compromised heavily. All those working for preservation and promotion of rights of citizens need to come to uphold the basic Indian ethos of pluralism and the core values of Indian Constitution. Jamiat like organizations will do better by focusing on training the youth in the abilities to counter Hate by spreading the message of peace and love, by training them in countering the prevalent misconceptions against religious minorities and against weaker sections of society.

August 02, 2018

India: End Soft Approach Towards Sanatan Sanstha, Says Writer Konkan writer Damodar Mauzo

End Soft Approach Towards Sanatan Sanstha, Says Writer Facing Threat from Right-Wing

Seeking closure of Sanatan Sanstha, Konkan writer Damodar Mauzo says common people should rise up to the occasion to combat the culture of fear propagated by right-wing outfits.

Devika Sequeira

01/Aug/2018

Panaji: Almost a decade after the October 2009 bomb blast in Margao brought the shadowy activities of the Sanatan Sanstha into the open, the recent police disclosure that well known Konkani writer Damodar Mauzo also figures on the list of those marked for elimination by the group has hit a raw nerve. The Sahitya Akademi awardee was provided security cover after intelligence reports from Karnataka alerted the Goa government of the threat to Mauzo.

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https://thewire.in/rights/end-soft-approach-towards-sanatan-sanstha-says-writer-facing-threat-from-right-wing

July 31, 2018

Alternative legal redress systems are welcome but remember as experience in UK has shown sharia councils are the preserves of clerics who are intolerant of women’s equality


Courts of injustice
Alternative legal redress systems are needed and welcome. But, as debate in the UK has shown, sharia councils are the preserves of clerics who are intolerant of women’s equality and rights.
Written by Javed Anand

https://indianexpress.com/article/opinion/columns/courts-of-injustice-sharia-law-triple-talaq-5282103/