August 22, 2019

India: Modi's Speech Highlights How Closely He's Working With RSS


Modi's Speech Highlights How Closely He's Working With RSS
by Swati Chaturvedi

Published: August 16, 2019 11:44 IST

The thrice-banned RSS (once during British times) is the new establishment. Courtesy its acolyte, Prime Minister Narendra Modi. Yesterday, on August 15, RSS chief Mohan Bhagwat, offered rare and generous public praise to Modi for ending Kashmir's special status via Article 370. Bhagwat, punning on the BJP's campaign slogan"Modi hai toh mumkin hain (With Modi, everything becomes possible)", said, "Article 370 iss liye gaya kyonki Modi hai toh mumkim hai (Article 370 could be scrapped only because of Modi)".

Nullifying Article 370's privileges for Kashmir constitutes one of the three core articles of faith for the RSS and the wider Sangh Parivar; the other two are introducing a common civil code so different religions cannot follow their own laws for issues like marriage and owning property, and building a Ram temple in Ayodhya.

I spoke to a number of BJP and Sangh leaders for this piece. They make two important points. Modi and his top aide and Home Minister Amit Shah have assured Bhagwat and his number two, Bhaiyyaji Joshi, that after Article 370, the other two priority agenda items will be carried out in this term of the union government under Modi. The RSS, now working in total tandem with Modi, has offered unstinted electoral support through its huge network of cadre and a place for Modi in the pantheon of Sangh greats (Modi's reference in his Independence Day speech to Sangh ideologue Syama Prasad Mookerjee who died in Kashmir in 1953 was no accident.)

The RSS and Modi relationship was not always this smooth. As in most matters concerning Modi, it was Shah, as party president during Modi's first term, who handled the matter. He made it a practice to call Bhagwat twice a week and was always available to the Sangh's top brass. Shah would travel to Nagpur once a month to ensure that he and Bhagwat remained on the same page and no government decision came as a shock to the Sangh.

With the economy heading into deep crisis, the feeling in the BJP is that delivering on the cultural and ideological agenda will keep its core voter satisfied and ensure that the headlines are not restricted to unemployment and the slowdown.

A tiny group of extremely powerful people is working carefully on what next. Says a senior BJP leader who is privy to the plans, "Article 370 was part of our manifesto, yet nobody believed that we would actually keep our promise. We did. Modi and Shah are not part of the Sangh, they are the Sangh and also very intuitive leaders. They know that the repeal (of 370) will bring us political windfall. India is now not squeamish about the fact that we are a 'Hindu Pradhan Desh' (Hindu majority country). The mood has changed. Modi runs an ideological government and this is the time for the RSS to showcase itself to India and ensure that our values reflect in the country."

RSS chief Mohan Bhagwat praised PM Modi for ending Kashmir's special status via Article 370 (File photo)

The RSS is pretty much running the country, so the point about showcasing is, arguably, moot. From the house on top of Raisina Hill - Rashtrapati Bhavan - to the top government offices and ministries in North and South block, all are run by former pracharaks (RSS volunteers). The RSS has funding like never before to communicate its ideology across the spectrum. It also has luminaries such as former president Pranab Mukherjee making house calls in Nagpur.

Even the sudden reference to population control by Modi in his speech is part of a careful script. The Modi government is already working on a scheme to incentivize small families. So what can we expect now? Incremental moves on the economy, no reining in of what is described as "tax terrorism", an outreach to industrialists, asking them to chip in and do their bit. And big and dramatic moves on the common civil code and Ram Mandir.

With the Supreme Court holding daily hearings in the Ram Mandir case, the government is hoping for a positive verdict in time for the crucial election in Uttar Pradesh next year. A uniform civil code is simpler, possibly following the Article 370 route in both houses of parliament.

"Modi has ensured his legacy with Kashmir. Good or bad, history will judge. But for the Sangh, he is now ahead of any other leader that the BJP has produced including Advani and Atal", says a senior Sangh ideologue. For the moment, let him have the last word.

(Swati Chaturvedi is an author and a journalist who has worked with The Indian Express, The Statesman and The Hindustan Times.)

Hindi Article-Faith-Blind Faith and Sectarian Nationalism

श्रद्धा, अंधश्रद्धा और वैज्ञानिक सोच - राम पुनियानी भारतीय राजनीति में भाजपा के उत्थान के समानांतर, देश में शिक्षा के पतन की प्रक्रिया चल रही है। देश की नई शिक्षा नीति का अंतिम स्वरूप क्या होगा, यह जानना अभी बाकी है। परंतु भाजपा, पाठ्यक्रमों और शोधकार्य को कौनसी दिशा देना चाहती है, यह उसके नेताओं के वक्तव्यों और भाषणों से जाहिर है। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने हाल में शिक्षाविदों की एक बैठक में फरमाया कि संस्कृत, दुनिया की सबसे वैज्ञानिक भाषा है और देश की शीर्ष शैक्षणिक संस्थाओं को इस भाषा पर काम करना चाहिए। उनके अनुसार, आने वाले समय में संस्कृत ही कम्प्यूटरों की भाषा होगी। इसके अतिरिक्त, मंत्रीजी ने कई अन्य रहस्योद्घाटन भी किए, जो उनके ज्ञान की गहनता और व्यापकता को उजागर करते हैं। एक मौके पर उन्होंने अणु और परमाणु की खोज का श्रेय चरक को दिया तो दूसरे मौके पर प्रणव ऋषि को। उनके अनुसार, ऋषि नारद ने सबसे पहले परमाणु संबंधी प्रयोग किए थे। जब वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने कहा था कि ज्योतिष शास्त्र, विज्ञान से ऊपर है। मंत्रीजी का मानना है कि गुरूत्वाकर्षण के सिद्धांत की चर्चा प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों में है। न्यूटन से बहुत पहले हमारे ऋषि-मुनि गुरूत्वाकर्षण बल के बारे में जानते थे। इस तरह के दावे करने वाले पोखरियाल अकेले नहीं हैं। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने पाठ्यक्रमों में ज्योतिष विद्या और पौरोहित्य-कर्मकांड जैसे विषय शामिल करवाए थे। उन्होंने स्कूल के बच्चों को पढ़ाए जाने वाले इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण करने का प्रयास भी किया था। इसे आगे चलकर शिक्षा के भगवाकरण का नाम दिया गया। मोदी के सत्ता में आने के बाद से तो प्राचीन भारत के बारे में अचंभित करने वाले दावे किए जा रहे हैं। मुंबई में एक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए मोदी ने कहा था कि भगवान गणेश इस बात का प्रमाण हैं कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी। संघ परिवार के नेताओं ने हमारा जो ज्ञानवर्धन किया है उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि प्राचीन भारत में हवाईजहाज, मिसाइलें, इंटरनेट, टेलीविजन और जैनेटिक इंजीनियरिंग आम थे। संघ परिवार के मुखिया मोहन भागवत पहले ही कह चुके हैं कि विज्ञान की प्रगति के लिए वेदों का अध्ययन आवश्यक है। गाय के राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश के साथ ही प्राचीन ज्ञान के गुणगान का एक नया अध्याय खुल गया है। ऐसा बताया जाता है कि गाय में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है और गाय का हर उत्पाद दैवीय और चमत्कारिक गुणों से संपन्न है। सरकार ने एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है जो ‘पंचगव्य‘ (गोबर, गौमूत्र, दूध, दही और घी का मिश्रण) पर शोध करेगी। रामायण और महाभारत की कहानियों की वैज्ञानिकता सिद्ध करने के लिए धनराशि उपलब्ध करवाई जा रही है। कुल मिलाकर प्रयास यही है कि आस्था और श्रद्धा, ज्ञान के पर्यायवाची बन जाएं। प्रयास यह भी है कि प्राचीन भारत को एक ऐसी आधुनिक दुनिया के रूप में प्रस्तुत किया जाए जिसने हजारों साल पहले वे वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल कर लीं थीं जो पश्चिमी राष्ट्रों ने पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों में कीं हैं। ये दावे हिंदू राष्ट्रवाद को मजबूत बनाने की परियोजना का हिस्सा हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा था था कि डार्विन का क्रम-विकास सिद्धांत इसलिए सही नहीं है क्योंकि हमारे पूर्वजों ने बंदरों को मनुष्य बनते नहीं देखा! ऐसा नहीं है कि विज्ञान को झूठा सिद्ध करने वाले दावे सिर्फ हिंदू धर्म के अनुयायी करते आए हैं। ईसाई कट्टरपंथियों ने डार्विन के सिद्धांत के प्रति उत्तर में विश्व के ईश्वर द्वारा रचे जाने का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। जिया-उल-हक के शासनकाल में पाकिस्तान में प्रस्ताव किया गया था कि बिजली की कमी से निपटने के लिए जिन्नात की बेपनाह ताकत का इस्तेमाल किया जाए। दरअसल हमेशा से और दुनिया में लगभग हर जगह तार्किक सोच का विरोध होता आया है। भारत में जब चार्वाक ने यह मानने से इंकार कर दिया कि वेद दैवीय रचनाएं हैं तो उसे प्रताड़ित किया गया और लोकायत परंपरा - जिसके अंतर्गत स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित किया जाता था - का दानवीकरण किया गया। यूरोप में गैलेलियो और कई अन्य वैज्ञानिकों के साथ चर्च ने क्या सुलूक किया, यह हम सबको ज्ञात है। तार्किक सोच को समाज के शक्तिशाली वर्ग, चाहे वे सामंत हों या पुरोहित, अपने वर्चस्व और सत्ता के लिए चुनौती मानते हैं। भारत में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के साथ ही अंबेडकर, भगतसिंह और नेहरू जैसे नेताओं ने तार्किक सोच को बढ़ावा दिया। जो लोग समानता पर आधारित आधुनिक प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण के विरोधी थे, जिन लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ कभी संघर्ष नहीं किया, जो जमींदारों, राजाओं और पुरोहित वर्ग के पिट्ठू थे - वे ही तार्किक सोच के विरोधी थे। इस वैचारिक समूह को लगा कि देश में जिस तरह के सामाजिक परिवर्तन हो रहे हैं उनसे भारत के गौरवशाली अतीत की छवि पूरी तरह खंडित हो जाएगी। नेहरू मानते थे कि वैज्ञानिक सोच ही भविष्य के आधुनिक भारत की नींव बन सकती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की बात राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में कही गई है। और इसी सोच के तहत, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद व भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र आदि जैसी संस्थाएं बनाई गईं। पिछले कुछ दशकों में हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के उदय के साथ, नेहरू की नीतियों को गलत ठहराया जा रहा है और तार्किक सोच को ‘विदेशी अवधारणा‘ बताया जा रहा है। आस्था और श्रद्धा को वैज्ञानिकता और तार्किकता से ऊंचा दर्जा दिया जा रहा है। यही कारण है कि अंधश्रद्धा के खिलाफ लड़ने वाले, गोलियों का शिकार हो रहे हैं। डॉ नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश को अपनी जान से इसलिए हाथ धोना पड़ा क्योंकि वे तार्किकता और वैज्ञानिक सोच के हामी थे। इसके विपरीत, मोदी से लेकर निशंक तक हिन्दू राष्ट्रवादी नेता एक ओर तार्किकता के विरोधी हैं तो दूसरी ओर जन्म-आधारित असमानता के समर्थक। हिन्दू राष्ट्रवाद आस्था को ज्ञान और श्रद्धा को विज्ञान बनाकर प्राचीन भारत का महिमामंडन कर रहा है। उसका अंतिम उद्देश्य उस युग के पदक्रम-आधारित समाज की पुनर्स्थापना है। (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

August 21, 2019

BOOK EXCERPT ‘If Hindutva is to sustain itself on a cow’s legs, it’ll crash at the hint of a crisis’: VD Savarkar


‘If Hindutva is to sustain itself on a cow’s legs, it’ll crash at the hint of a crisis’: VD Savarkar


Poster announces Zionism and Hindutva event in Bombay on 26 Aug 2019 (with Subramanium Swamy)

India - Uttar Pradesh: In Yogi Adityanath's Cabinet Expansion, A Promotion For Riot-Accused MLA


In Yogi Adityanath's Cabinet Expansion, A Promotion For Riot-Accused MLA
Sources have said the cabinet reshuffle was carried out with one eye on Assembly polls, although that is still three years away. The BJP swept to power in the state with a commanding mandate in 2017 polls, winning 325 of 403 seats
All India | Written by Alok Pandey, Edited by Chandrashekar Srinivasan (with inputs from IANS) | Updated: August 21, 2019 13:41 IST


India: A new battle ground in Sikkim - Guru Dongmar and Guru Nanak

[ . . . ] If devout Sikhs believe that Guru Nanak went to Guru Dongmar, as I do, nothing will ever change that. But my question is, why on earth do we Sikhs need a ‘Gurdwara’ to exist at Guru Dongmar? [ . . . ]

I also have some words for my Sikkimese brethren. Chill out. Nix the ‘I am Gurudongmar’ memes for they are antithetical to the generosity of spirit that truly defines you. There is nothing here to fight about. I actually agree with you that Guru Dongmar should be left as beautiful and pristine as it always has been. By the way, you should be as offended by the idea of building a spanking new monastery there as you might be at the prospect of a shiny marble-clad Gurdwara being built. And as a fairy tale concocted in modern times. [ . . . ]


August 19, 2019

India: Modi govt has been working for a Uniform Civil Code ... | 16 Aug 2019, The Print

The Print

Modi govt has been working for a Uniform Civil Code and we didn’t even notice. Until now
In the absence of 'common civil code', religious prerogative of one community in a secular society has become a contentious issue in India.
Seshadri Chari (16 August, 2019)