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May 29, 2020

Hindi Article: Babri Mosque: Ramjanmbhumi and Buddhist Relices


27 मई 2020 बाबरी मस्जिद, रामजन्मभूमि और बौद्ध पुरावशेष इस समय देश में तालाबंदी है. उत्पादन बंद है, निर्माण कार्य बंद हैं और व्यापार-व्यवसाय बंद है. परन्तु अयोध्या में राममंदिर का निर्माण चल रहा है. इसकी राह उच्चतम न्यायालय ने प्रशस्त की थी. अदालत के इस निर्णय पर समुचित बहस नहीं हुई क्योंकि ‘मुस्लिम पक्ष’ ने पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि फैसला चाहे जो हो, वह उसे स्वीकार करेगा. ‘हिन्दू पक्ष’, जिसमें आरएसएस और उसकी संतानें शामिल हैं, का पुराना नारा था ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’. उच्चतम न्यायालय ने विवादित भूमि के स्वामित्व के मुद्दे पर विस्तार से विचार नहीं किया. इससे पहले, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हिन्दुओं की इस ‘आस्था’ को प्रधानता दी थी कि भगवान राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ था और उसने भूमि को तीन भागों में बाँट दिया था. इस ज़मीन पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का कानूनी कब्ज़ा था. हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए और अच्छी खबर यह थी कि सरकार ने राम मंदिर के निर्माण का काम अपने हाथों में ले लिया. भाजपा के अमित शाह ने कहा कि अयोध्या में राम का विशाल और भव्य मंदिर बनाया जायेगा, जिसका शिखर आसमान छुएगा. मंदिर के निर्माण का काम 11 मई को शुरू हुआ और इस समय ज़मीन का समतलीकरण किया जा रहा है. विहिप के प्रवक्ता विनोद बंसल के अनुसार, समतलीकरण के दौरान कई तरह के अवशेष मिल रहे हैं जिनमें “पुरातात्विक महत्व के अवशेष जैसे पत्थर के बने फूल, कलश, आमलक, दोरजांब इत्यादि शामिल हैं. इनके अतिरिक्त सात ब्लैक टचस्टोन के स्तंभ, आठ लाल सैंडस्टोन के स्तंभ, पांच फीट आकार का एक शिवलिंग और देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियाँ भी मिलीं हैं.” इस पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं हैं. कुछ लोगों ने वामपंथी इतिहासविदों, विशेषकर रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब, पर देश को भ्रमित करने और बाबरी मस्जिद का विवाद खड़ा करने का आरोप लगाया. के.के. मोहम्मद नामक एक पुरातत्ववेत्ता ने दावा किया कि जो अवशेष मिले हैं, वे किसी मंदिर का भाग थे. ट्विटर पर थापर और इरफ़ान हबीब जैसे प्रतिभाशाली इतिहासविदों पर जम कर भड़ास निकाली गई और मुस्लिम शासकों को मंदिरों का विध्वंसक बताया गया. परन्तु इस मामले में जो दूसरी प्रतिक्रिया सामने आई है वह हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए चिंता का विषय हो सकती है. अवशेषों के फोटो देखने के बाद बौद्धों के एक बड़े तबके ने दावा किया है कि जिसे शिवलिंग बताया जा रहा है दरअसल वह एक बौद्ध स्तम्भ का हिस्सा है और अवशेषों पर जो नक्काशी है वह अजंता और एलोरा के कलाकृतियों की नाकाशी से मेल खाती है. इस सिलसिले में अयोध्या मामले में निर्णय को भी उद्दृत किया जा रहा है. निर्णय में कहा गया था, “कार्नेजी ने लिखा है कि मस्जिद के निर्माण में जिन स्तंभों का प्रयोग किया गया है वे इन बौद्ध स्तंभों से बहुत मिलते-जुलते हैं, जो उन्होंने बनारस में देखे थे.” इस मुद्दे पर कई बौद्ध समूह आगे आये हैं और वे न्यायपालिका से हस्तक्षेप करने की मांग करेंगे. वे यूनेस्को से भी यह अपील कर रहे हैं कि अयोध्या में उसकी निगरानी में उत्खनन करवाया जाना चाहिए. ब्राह्मणवादी कोलाहल में यह तथ्य भुला ही दिया गया है कि अयोध्या का पुराना नाम साकेत था और साकेत बौद्ध संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र था. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘रेवोलुशन एंड काउंटर-रेवोलुशन इन एनशिएन्ट इंडिया’ में लिखा है, “भारत का इतिहास, बुद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच टकराव के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.” यह तर्क इस सांप्रदायिक धारणा के खिलाफ है कि भारत में मूलतः हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच टकराव होता रहा है. आंबेडकर भारत के इतिहास को क्रांति और प्रतिक्रांति के रूप में देखते हैं. वे मानते हैं कि बौद्ध धर्म एक क्रांति था क्योंकि वह समानता और अहिंसा पर आधारित था. उनके अनुसार, मनुस्मृति, आदि शंकराचार्य और पुष्यमित्र शुंग इत्यादि, भारत से बौद्ध धर्म का भौतिक और वैचारिक नामोनिशान मिटाने के अभियान के प्रतीक हैं. वे इसे प्रतिक्रांति कहते हैं. इस प्रतिक्रांति के अंतर्गत, हजारों बौद्ध विहारों को नष्ट कर दिया गया और बौद्ध भिक्षुकों को मौत के घाट उतार दिया गया. सन 1980 के दशक में हिन्दू सांप्रदायिक ताकतों ने एक सतत प्रचार अभियान चलाकर भारत के इतिहास के उस संस्करण को वैधता दिलवाई जो काफी हद तक अंग्रेजों द्वारा फैलाये गए भ्रमों पर आधारित था. बाबरी मस्जिद के बारे में ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा था कि ‘हो सकता है कि वहां मंदिर रहा हो’. हिन्दू राष्ट्रवादियों ने एक कदम और आगे बढ़कर यह घोषणा कर दी कि न केवल वहां एक मंदिर था बल्कि वह राम का मंदिर था और उसी स्थान पर राम का जन्म हुआ था! तथ्य यह है कि अयोध्या में ऐसे दर्जनों मंदिर हैं जहाँ के पुजारी यह दावा करते हैं कि उनका मंदिर जिस स्थान पर है, वहीं राम का जन्म हुआ था. सच का पता लगाने के पुरातात्विक प्रयास सफल नहीं हुए. पुरातत्ववेत्ता स्पष्टता से और निश्चयपूर्वक कुछ भी कहने की स्थिति नहीं हैं. यही कारण है कि जहाँ मोहम्मद ने यह दावा किया कि उस स्थान पर मंदिर था वहीं अन्य पुरातत्ववेत्ताओं के अलग राय थी. और इसीलिये उच्चतम न्यायालय ने विवाद के इस पक्ष पर कोई टिपण्णी नहीं की. क्या हमारी अदालतें और यूनेस्को इतिहास को उस व्यापक परिदृश्य में देखेंगीं जिसकी बात आंबेडकर करते हैं. एक व्याख्या यह है कि ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति में बौद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल नष्ट कर दिए गए और बाद में मुसलमान शासकों ने इन स्थलों को लूटा जबकि प्रचार यह किया जाता है कि मुस्लिम लुटेरों ने इन स्थलों को नष्ट किया. कई निष्पक्ष और पूर्वाग्रहमुक्त इतिहासकारों ने लिखा है कि मुस्लिम राजाओं ने पवित्र स्थलों को या तो संपत्ति के लिए लूटा या अपने राज्य के विस्तार के लिए. ऐसा भी हो सकता है कि पहले वैचारिक कारणों से बौद्ध स्थलों को नष्ट किया गया और बाद में मुस्लिम राजाओं ने उन स्थलों में जो कुछ बचा-खुचा था, उसे भी लूट लिया. बौद्ध धर्म पर हुए इस हमले को छिपाने से हम उन कारणों का पता नहीं लगा पाएंगे जिनके चलते बौद्ध धर्म भारत - जहाँ वह जन्मा था - से गायब हो गया. बौद्ध विरासत भारत और पूरे विश्व के लिए एक अनमोल खज़ाना है और उसे सुरक्षित रखना हम सबका कर्त्तव्य है. बहरहाल, राम मंदिर के राज्य द्वारा निर्माण से सोमनाथ मंदिर की याद आना स्वाभाविक है. स्वतंत्रता के तुरंत बाद यह मांग उठी कि राज्य को इस मंदिर का पुनर्निर्माण करना चाहिए. महात्मा गाँधी, जो कि एक महान हिन्दू थे, ने कहा कि हिन्दू समुदाय अपना मंदिर बनाने में सक्षम है. राज्य को उसमें नहीं पड़ना चाहिए. गाँधी के चेले और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरु, देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन किया जाने के खिलाफ थे. आगे चल कर नेहरु ने विशाल उद्योगों, बांधों और शैक्षणिक संस्थानों की नींव रखी और उन्हें आधुनिक भारत के मंदिर बताया. और आज हम क्या देख रहे हैं? सरकार मंदिर बना रही है और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य धन कमाना है. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

May 26, 2020

Retrieving the true meaning of word Jihad


Retrieving the True meaning of word Jihad Ram Puniyani Words Jihad and Jihadi have been in abundant use for the negative purposes from last two decades in particular. They have been closleyl linked to the word terrorism and violence, done by section of Muslims here and there. This global use of word is particularly a post 9/11 phenomenon. Just to recapitulate after the WTC was hit by two aeroplanes; the building sunk leading the death of nearly three thousand innocent people. The victims belonged to most countries and religions. In the aftermath; Osama bin Laden called it Jihad. American media coined the word Islamic terrorism since then. Most of the acts indulged in by Muslim terror groups have been labelled under this title. This; irrespective of the fact that many an Islamic Scholars, many a Muslim clerics like Maulanas of Deoband and Barelvi, stating that Islam does not approve of violence against innocent people. The words have stuck. This has also beoame one more weapon in the hands of communal sectarian elements. Apart from the mainstream media social media has been delving this with gay abandon using these words in a derogatory way. The lap media also called Godi media, which is an important part of the opinion making against Muslims has been using it day in and day out. Recently (March 11, 2020), Mr. Sudhir Chaudhary, the Editor-in-Chief of Zee channel in a show went on to the limits of this misrepresentation by showing a chart and classifying Jihad into various categories, Love, Jihad, Land Jihad and latest in series being Corona Jihad in the wake of Tablighi Jamaat event. Mr Chowdhary concluded that all these types of Jihad are being done to weaken India. Surely, these types of programs have been increasing and intensifying Hate against Muslims and Jihad. Unlike most of the times, this time around a complaint was filed against the said editor, a FIR was filed and lo and behold the editor’s tune changed. In the next program he talked respectfully about the word Jihad! The tone and tenor changed. Was it a late realization or the fear of facing criminal action which made him change the tune, he alone should know, but that’s another chapter to the story? As such jihad is by and large used as synonym for violence, terrorism. This is very much contrary to the its use in Koran.. Islamic scholar Asghar Ali Engineer argues that its use in Koran is multilayered. It stands for ‘utmost striving’ and has nothing to do with violence against innocents. As per him the concept of Jihad is far above violence. Those indulging in power games have used it as a cover for expanding power and called it as Holy War. This is very similar to the use of word Crusade by Christian Kings and Dharm Yudh by Hindu kings. A deeper and more rational study of Koran and Hadith bring forth the real meaning of the term. Sufi’s who were away from the power struggle and focussed on spiritual aspects of religion like Bhakti Saints or liberation theologians, unfolded the deeper meaning of the term. Engineer points out that “it is for this reason that they describe war as jihad-e-Asghar and jihad to control one’s greed and selfish desires as jihad-e-Akbar (Great jihad)” (On Multi Layered Concept of Jihad, in A Modern Approach to Islam, Dharmaram , Page 26, 2003, Bangalore) The reference to Jihad comes in Koran over 40 times, mostly referring to Jihad-e-Akbar, striving to overcome personal greed and selfishness. The real transformation of the word Jihad in popular perceptions and Chaudhary is the extreme example of that, takes place during the training of Mujahideen in the few specially set up Madarssas in Pakistan. This was initiated and coordinated by America in the decade of 1980s, when the Russian Army occupied Afghanistan. That was the time American forces were totally demoralised due to their humiliating defeat in Vietnam, at the hands of Vietnamese people. To confront the Russian army, US planned to join the anti Russian forces. For this with the help of extremist Salafi version of Islam, they promoted the radical tendencies within a section of Muslims. The brain washing of the Asian Muslim youth as Mujahedeen to Taliban took place in few Pakistani Madrassas, totally funded by America. For this funding opium trade was also put into operation. The brainwashing module designed in Washington incorporated many components which also distorted the concept of Kafir, and created Hate against communists. Communists were labelled as Kafirs (Non believers) and so killing them was presented as Jihad. Getting killed while doing such an act was to be rewarded with entry pass to Jannat with 72 virgins waiting for those embracing this path. America further went on to promote Taliban and Al Qaeda, which joined anti Russian forces, leading to defeat of Russian forces. Mahmood Mamdani in his book ‘Good Muslim Bad Muslim’ makes an inference based on CIA documents that America invested 8 thousand million dollars and also supplied seven tonnes of armaments, including the most sophisticate missiles to these forces. One also recalls the Al Qaeda leaders’ visit to US, White house. In the Press meet the then US President Ronald Regan, introduced them as being the equivalents of founding fathers of United States as they are fighting against the evil of communism. Now of course the situation has taken its own turn and nearly three decades after their inception the same elements, later followed by ISIS and IS acted like Frankenstein’s monsters, killing Muslims in large numbers. It is estimated that over 70000 Pakistanis have been killed due to the action of these groups, who were propped up and nurtured by US to enhance its control over the oil wells of West Asia. The likes Sudhir Choudhary can merrily propagate the Hate using the term Jihad. That such elements can also be partly controlled through the process of law is a part of great learning after the FIR filed against him. One hopes that such hate filled programs will come to a halt once we combat them ideologically and after resorting to the provisions of Indian Constitution.

May 23, 2020

Can Humanism Survive the onslaught of Hate?


Can Humanism Survive the Onslaught of Hate? Ram Puniyani Lately when India is undergoing the massive crisis of the Corona epidemic and the offshoots of its mishandling, we have also seen the pandemic being used to demonise a particular community in India. These hate mongers, operating through powerful medium of TV, and widespread social media which also has resorted to Fake news has intensified the Hate against religious minority. In this vast phenomenon, it seemed that all is lost as far as amity between people of different religions is concerned. Despite this broad generalisation one feels happy when one comes to know of few incidents where religious communities come forward to help each other. The most touching such incidence of amity came forward in the form of story of Amrit and Farooq. They were travelling in a truck from Surat to UP. On way Amrit, a worker, fell sick and most other travellers, asked him to leave the truck in the middle of the night. As he was offloaded, he was not alone. His friend Farooq, another worker, also came down with him. Farooq put the sick Amrit in his lap and cried for help which caught the attention of others and an ambulance landed up to take Amrit to hospital! In another incidence one worker, who had an differently able child, took the bicycle of another person, leaving a touching letter of apology, saying that he was helpless as he has to travel with his children and there is no other means. Many a people reported it as a theft of the bicycle while the owner of the bicycle, Prabhu Dayal took it in a stride. The one who took away the bicycle was Mohammad Iqbal Khan. In Sewri Mumbai, Pandurang Ubale, a senior citizen died due to age related and other problems. Due to lock down his immediate relative’s could not organize the funeral. His Muslim neighbours came forward and did his last rites as per the Hindu customs. Similar cases are reported from Bangalore and Rajasthan. In TIhar jail, the Hindu inmates joined the Muslim in keeping the Roza (fasting). While mosque in Pune, (Azam Campus) and a Church in Manipur has been offered as a place for quarantine. In another lovely incident a Muslim girl takes shelter in a Hindu home and the host gets up early in morning to prepare and give her food for Sehri, a pre morning meal before Rosa begins. One can go on and on. Surely what is reported must be a tip of the iceberg as many such incidents must be going on unnoticed and un reported. The feeling one was getting after the section of media jumped to communalise spread of Corona, coined words like Corona bomb, Corona jihad, one felt the efforts to break the mutual trust between Hindus and Muslims may succeed totally after all. The deeper inherent humanism of communities has ensured that despite the Hate being manufactured and propagated by communal forces for their political agenda, the centuries old amity and the fraternity promoted by freedom movement will sustain itself somewhere, though it is suffering deep wounds due to the religious nationalists. India’s culture has been inherently syncretic, synthesising the diversity in various forms. The medieval period which is most demonized, and as many of the sectarian ideologues are presenting it as a period of suffering of Hindus, the fact is that it is during this period that Bhakti tradition flourished and literature in Indian languages progressed during this period. Even Persian, which was used in the court of kings interacted with Awadhi and produced the Urdu, which is an Indian language. It is in this period when the most popular story of Lord Ram was written by Goswami Tulsidas. Tulsidas himself in his autobiography Kavaitavali writes that he sleeps in a mosque. As far literature is concerned many an outstanding Muslim poets wrote wonderful poetry in praise of Hindu Gods, one can remember Rahim and Raskhan’s brilliant outpourings in praise of Lord Shri Krishna. The food habits, the dress habits and social life emerged with components from these two major religions. The sprinkling of Christianity in different aspects of Indian life is as much visible. It was the symbol of deep interaction of Hindus and Muslims that Muslims followed the Bhakti saints like Kabir and many a Hindus visit the Sufi Saint Dargahs (Shrines). This interactive element is vibrantly visible in Hindi films. Here one can see the outstanding devotional songs in praise of Hindu gods composed by Muslims. One of my favourite’s remains, ‘Man Tarpat hari Darshan ko Aaj’ (My soul is longing to see Hari). This song was written by Shakil Badayuni, composed by Naushad Ali and sung by Mohammad Rafi. The latter must have sung innumerable devotional songs. Our freedom movement, despite the divisive role of British, the Muslim communalists and Hindu communalists, brought together people of all religions, in the struggle against colonial powers. Many a literary people painted the beautiful interaction of diverse communities. During freedom movement, and in the aftermath as communal violence flared up, the likes of Ganesh Shankar Vidyarthi, and towering above all Mahatma Gandhi tried to douse the fire of violence through exemplary efforts, efforts in which Muslims and Hindus both reciprocated despite the hate spread by the communal forces. One recalls here the efforts of those friends, who laid down their lives to combat the fire of Hate. In Gujarat the names of Vasant Rao Hegiste and Rajab Ali will always be remembered as they laid down their lives, as a team, to restore sanity. This interaction is very deep and the present Government cannot tolerate the impact of Islamic-Muslim component in our culture. That’s precisely the reason that attempts are on to change the names of cities (Faizabad-Ayodhya, Mughal Sarai-Deen dayal Upadhyay etc) The deeper interaction of communities is present in all facets of our society. The examples during Corona crisis have again brought to fore the fact that Indian culture is essentially a product of synthesis of different aspects of many religions prevalent here.

May 21, 2020

Hindi Article- Can Humanism survive Hate


नफरत की आंधी नहीं बुझा पायेगी इंसानियत की शमा को इस समय हमारा देश कोरोना महामारी की विभीषिका और उससे निपटने में सरकार की भूलों के परिणाम भोग रहा है. इस कठिन समय में भी कुछ लोग इस त्रासदी का उपयोग एक समुदाय विशेष का दानवीकरण करने के लिए कर रहे हैं. नफ़रत के ये सौदागर, टीवी और सोशल मीडिया जैसे शक्तिशाली जनसंचार माध्यमों के जरिये धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. इस अभियान में फेक न्यूज़ एक बड़ा हथियार है. यह सब देख कर किसी को भी ऐसा लग सकता है कि दोनों समुदायों के बीच इतनी गहरी खाई खोद दी गई है कि उसे भरना असंभव नहीं तो बहुत कठिन ज़रूर है. परन्तु इस अँधेरे में भी आशा के एक किरण है. और वह है दोनों समुदायों के लोगों का एक दूसरे की मदद के लिए आगे आना. सांप्रदायिक सौहार्द की सबसे मार्मिक घटना अमृत और फारूख से जुड़ी है. वे एक ट्रक से सूरत से उत्तरप्रदेश जा रहे थे. रास्ते में अमृत बीमार पड़ गया और अन्य मजदूरों ने संक्रमण के डर से उसे आधी रात को ही रास्ते में उतार दिया. परन्तु वह अकेला नहीं था. उसका साथी फारूक भी उसके साथ ट्रक से उतरा. उसने सड़क किनारे अमृत को अपनी गोद में लिटाया और मदद की गुहार लगाई. अन्य लोगों ने उसकी मदद की और जल्दी ही एक एम्बुलेंस वहां आ गई, जिसने अमृत को अस्पताल पहुँचाया. एक अन्य घटना में एक मजदूर, जिसका बच्चा विकलांग था, ने एक अन्य मज़दूर की साइकिल बिना इज़ाज़त के ले ली. उसने एक कागज़ पर यह सन्देश भी छोड़ा कि उसे उसके बच्चों के साथ दूर जाना है और उसके पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है कि वह साइकिल चुरा ले. साइकिल के मालिक प्रभु दयाल ने इसका जरा भी बुरा नहीं माना. साइकिल ले जाने वाले शख्स का नाम था मोहम्मद इकबाल खान. मुंबई के सेवरी में पांडुरंग उबाले नामक एक बुजुर्ग की अधिक उम्र और अन्य बीमारियों से मौत हो गई. लॉकडाउन के कारण उसके नजदीकी रिश्तेदार उसके घर नहीं पहुँच सके. ऐसे में उसके मुस्लिम पड़ोसी आगे आये और उन्होंने हिन्दू विधि-विधान से उसका क्रियाकर्म किया. इसी तरह की घटनाएं बैंगलोर और राजस्थान से भी सामने आईं. दिल्ली के तिहाड़ जेल में हिन्दू बंदियों ने अपने मुसलमान साथियों के साथ रोज़ा रखा. पुणे में एक मस्जिद (आज़म कैंपस) और मणिपुर में एक चर्च को क्वारेंटाइन केंद्र के रूप में इस्तेमाल के लिए अधिकारियों के हवाले कर दिया गया. दिल को छू लेने वाले एक अन्य घटनाक्रम में, एक मुस्लिम लड़की ने एक हिन्दू घर में शरण ली और मेज़बानों ने तड़के उठ कर उसके लिए सेहरी का इंतजाम किया. ऐसे और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं. यह भी साफ़ है कि ऐसी असंख्य घटनाएं देश के अलग-अलग हिस्सों में हुईं होंगीं उनमें से बहुत कम मीडिया में स्थान पा सकी होंगीं. कोरोना के हमले के बाद से जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा था, जिस धड़ल्ले से कोरोना बम और कोरोना जिहाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल हो रहा था उससे ऐसा लग रहा था कि सांप्रदायिक तत्त्व हिन्दुओं और मुसलमानों को एक दूसरे का दुश्मन बनाने के अपने अभियान में सफल हो जाएंगे. परन्तु अंततः यह सिद्ध हुआ कि नफरत फैलाने वाले भी मनुष्य की मूल प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त नहीं सकते. धार्मिक राष्ट्रवादियों की लाख कोशिशों के बाद भी वह बंधुत्व और सद्भाव, जो हमारे स्वाधीनता संग्राम की विरासत है, मरा नहीं है. वह लोगों के दिलों में जिंदा है. भारतीय संस्कृति मूलतः साँझा संस्कृति है जो विविधताओं को अपने में समाहित कर लेती है. भारत के मध्यकालीन इतिहास को अक्सर एक स्याह दौर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. सम्प्रदायवादी लेखक उसे एक ऐसे दौर के रूप में चित्रित करते हैं जिसमें हिन्दुओं को घोर दुःख भोगने पड़े. परन्तु यही वह दौर था जब भक्ति परंपरा फली-फूली और भारतीय भाषाओं में विपुल साहित्य सृजन हुआ. यही वह दौर था जिसमें राजदरबारों की भाषा फारसी और जनता की भाषा अवधी के मेल से उर्दू का जन्म हुआ. यही वह दौर था जब गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम की कथा एक जनभाषा में लिखी. तुलसीदास ने अपनी आत्मकथा ‘कवितावली’ में लिखा है कि वे मस्जिद में सोते थे. उसी दौर में अनेक मुस्लिम कवियों ने हिन्दू देवी-देवताओं की शान में अद्भुत रचनाओं का सृजन किया. रहीम और रसखान ने भगवान श्रीकृष्ण पर जो कविताएँ लिखीं हैं उनका कोई जोड़ नहीं है. हमारे देश के खानपान, पहनावे और सामाजिक जीवन पर इन दोनों धर्मों की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है. भारतीयों के जीवन पर ईसाई धर्म का असर भी सबसे सामने है. यह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच प्रेमपूर्ण रिश्तों का प्रतीक ही तो है कि जहां कई मुसलमान कबीर जैसे भक्ति संतों के अनुयायी हैं वहीं अनेक हिन्दू सूफी संतों की दरगाहों पर चादर चढ़ाते हैं. हिंदी फिल्में भी इस साँझा संस्कृति को प्रतिबिंबित करतीं हैं. कितने ही मुस्लिम गीतकारों ने दिल को छू लेने वाले भजन लिखे हैं. इनमें से मेरा सबसे पसंदीदा है ‘मन तड़फत हरि दर्शन को आज’. इस भजन को शकील बदायूंनी ने लिखा था, संगीत दिया था नौशाद ने और गाया था मुहम्मद रफ़ी ने. हिन्दू और मुस्लिम संप्रदायवादियों और अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी हमारे स्वाधीनता आन्दोलन का मूल चरित्र बना रहा. सभी धर्मों के लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर यह लड़ाई लड़ी. कई रचनकारों ने विविध समुदायों के मेल के शब्दचित्र खींचे है. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान और देश के बंटवारे के बाद जो सांप्रदायिक हिंसा फैली, उसे नियंत्रित करने में गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर महात्मा गाँधी तक ने महती भूमिका निभाई. गुजरात में वसंत राव हेंगिस्ते और रजब अली नामक दोस्तों ने सांप्रदायिक पागलपन के खिलाफ लडाई में अपनी जान गंवा दी. आज की सरकार को हिन्दुओं और मुसलमाओं का एका, उनके बीच प्रेम और सौहार्द मंज़ूर नहीं है. और यही कारण है कि वो शहरों (इलाहाबाद, मुग़लसराय) तक के नाम बदल रही है. हमारे समाज की रग-रग में प्रेम और सांप्रदायिक सौहार्द है. कोरोना काल में हमें हमारी संस्कृति के इसी पक्ष के दर्शन हो रहे हैं. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

May 16, 2020

Hindi Article- What does Jihad mean


जिहाद के असली अर्थ को समझने की ज़रुरत जिहाद और जिहादी - इन दोनों शब्दों का पिछले दो दशकों से नकारात्मक अर्थों और सन्दर्भों में जम कर प्रयोग हो रहा है. इन दोनों शब्दों को आतंकवाद और हिंसा से जोड़ दिया गया है. 9/11 के बाद से इन शब्दों का मीडिया में इस्तेमाल आम हो गया है. 9/11/2001 को न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारत से दो हवाईजहाजों को भिड़ा दिया गया था. इस घटना में लगभग 3,000 निर्दोष लोग मारे गए थे. इनमें सभी धर्मों और राष्ट्रीयताओं के व्यक्ति शामिल थे. ओसामा बिन लादेन ने इस हमले को जिहाद बताया था. इसके बाद से ही अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया. मुस्लिम आतंकी गिरोहों द्वारा अंजाम दी गई सभी घटनाओं को इस्लामिक आतंकवाद बताया जाने लगा. देवबंद और बरेलवी मौलानाओं सहित इस्लाम के अनेक अध्येताओं के बार-बार यह साफ़ करने के बावजूद कि इस्लाम निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा की इज़ाज़त नहीं देता, इस शब्द का बेज़ा प्रयोग जारी है. जिहाद शब्द सांप्रदायिक और विघटनकारी ताकतों के हाथों में एक हथियार बन गया है. सोशल मीडिया के अलावा मुख्यधारा के मीडिया में भी इसका धडल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. गोदी मीडिया इस जुमले का प्रयोग मुसलमानों के विरुद्ध ज़हर घोलने के लिए कर रहा है. हाल (11 मार्च 2020) में ज़ी न्यूज़ के मुख्य संपादक श्री सुधीर चौधरी ने तो सभी हदें पार कर लीं. उन्होंने बाकायदा एक चार्ट बनाकर जिहाद के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया - लव जिहाद, लैंड जिहाद और कोरोना जिहाद! चौधरी का कहना था कि इन विभिन्न प्रकार के जिहादों द्वारा भारत को कमज़ोर किया जा रहा है. चौधरी क्या कहना चाह रहे थे, यह तो वही जानें परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि टीवी पर इस तरह के कार्यक्रमों से मुसलमानों और जिहाद के बारे में मिथ्या धारणाएं बनती हैं. गोदी मीडिया के लिए इस तरह का दुष्प्रचार कोई नई बात नहीं है. परन्तु इस बार जो नया था वह यह कि संपादक महोदय के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई. इसके तुरंत बाद उनका सुर बदल गया. अगले कार्यक्रम में उन्होंने जिहाद शब्द का काफी सावधानी और सम्मानपूर्वक से इस्तेमाल किया. यह कहना मुश्किल है कि उन्हें अचानक कोई ज्ञान प्राप्त हुआ या फिर क़ानूनी कार्यवाही से भय से वे डर गए. आज जिहाद शब्द का इस्तेमाल हिंसा और आतंकवाद के पर्यायवाची बतौर किया जाता है. परन्तु कुरान में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है. इस्लामिक विद्वान असग़र अली इंजीनियर के अनुसार कुरान में इस शब्द के कई अर्थ हैं. इसका मूल अर्थ है अधिकतम प्रयास करना या हरचंद कोशिश करना. निर्दोषों के साथ खून-खराबे से जिहाद का कोई लेनादेना नहीं है. हां, बादशाह और अन्य सत्ताधारी इस शब्द की आड़ में अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं. अपने प्रभावक्षेत्र में विस्तार की लडाई को वे धार्मिक रंग देते रहे हैं. ठीक इसी तरह, ईसाई राजाओं ने क्रूसेड और हिन्दू राजाओं ने धर्मयुद्ध शब्दों का दुरुपयोग किया. कुरान और हदीस के गहराई और तार्किकता से अध्ययन से हमें जिहाद शब्द का असली अर्थ समझ में आ सकता है. भक्ति संतों की तरह, सूफी संत भी सत्ता संघर्ष से परे थे और धर्म के आध्यात्मिक पक्ष पर जोर देते थे. उन्होंने इस शब्द के वास्तविक और गहरे अर्थ से हमारा परिचय करवाया. इंजीनियर के अनुसार, “यही कारण है कि वे युद्ध को जिहाद-ए-असग़र और अपनी लिप्सा व इच्छाओं पर नियंत्रण की लडाई को जिहाद-ए-अकबर (महान या श्रेष्ठ जिहाद) कहते हैं” (‘ऑन मल्टीलेयर्ड कांसेप्ट ऑफ़ जिहाद’, ‘ए मॉडर्न एप्रोच टू इस्लाम’ में, धर्मारम, पृष्ठ 26, 2003, बैंगलोर). कुरान में जिहाद शब्द का प्रयोग 40 से अधिक बार किया गया है और अधिकांश मामलों में इसे ‘जिहाद-ए-अकबर’ के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है - अर्थात अपने मन पर नियंत्रण की लडाई. जिहाद शब्द के गलत अर्थ में प्रयोग - चौधरी जिसके एक उदाहरण हैं - की शुरुआत पाकिस्तान में विशेष तौर पर स्थापित मदरसों में मुजाहीदीनों के प्रशिक्षण के दौरान हुई. यह प्रशिक्षण अमरीका के इशारे पर और उसके द्वारा उपलब्ध करवाए गए धन से दिया गया था. यह 1980 के दशक की बात है. उस समय रूसी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था और वियतनाम में अपनी शर्मनाक पराजय से अमरीकी सेना का मनोबल इतना टूट गया था कि वह रुसी सेना का मुकाबला करने में सक्षम नहीं थी. इसलिए अमरीका ने मुजाहीदीनों के ज़रिये यह लड़ाई लड़ी. अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी सलाफी संस्करण का इस्तेमाल कर मुस्लिम युवाओं के एक हिस्से को जुनूनी बना दिया. मुस्लिम युवाओं को अमरीका के धन से संचालित मदरसों में तालिबान बना दिया गया. उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम का पाठ्यक्रम वाशिंगटन में तैयार किया गया. उन्हें अन्य समुदायों से नफरत करना सिखाया गया और काफिर शब्द का तोड़ा-मरोड़ा गया अर्थ उन्हें समझाया गया. उन्हें बताया गया कि कम्युनिस्ट काफ़िर हैं और उन्हें मारना जिहाद है. और यह भी कि जो लोग जिहाद करने हुए मारे जाएंगे उन्हें जन्नत नसीब होगी जहाँ 72 हूरें उनका इंतज़ार कर रहीं होंगीं. अमरीका ने ही अल कायदा को बढ़ावा दिया और अल कायदा भी रूस-विरोधी गठबंधन का हिस्सा बन गया. महमूद ममदानी ने अपनी पुस्तक ‘गुड मुस्लिम, बेड मुस्लिम’ में लिखा है कि सीआईए के दस्तावेजों के अनुसार, अमरीका ने इस ऑपरेशन पर लगभग 800 करोड़ डॉलर खर्च किये और मुजाहीदीनों को भारी मात्रा में आधुनिक हथियार उपलब्ध करवाए, जिनमें मिसाइलें शामिल थीं. हम सबको याद है कि जब अल कायदा के नेता अमरीका की अपनी यात्रा के दौरान वाइट हाउस पहुंचे तब राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने उनका परिचय ऐसे लोगों के रूप में दिया जो कम्युनिज्म की बुराई के खिलाफ लड़ रहे हैं और अमरीका के निर्माताओं के समकक्ष हैं. यह बात अलग है कि बाद में यही तत्त्व भस्मासुर साबित हुए और उन्होंने बड़ी संख्या में मुसलमानों की जान ली. इस्लामिक स्टेट और आईएसआईइस जैसे संगठन भी अस्तित्व में आ गए. ऐसा अनुमान है कि पश्चिम एशिया के तेल के कुओं पर कब्ज़ा करने के अमरीकी अभियान के तहत जिन संगठनों को अमरीका ने खड़ा किये था उन्होंने अब तक पाकिस्तान के 70,000 नागरिकों की जान ले ली है. सुधीर चौधरी जैसे लोग ‘जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए कर रहे हैं. यह संतोष की बात है कि कानून का चाबुक फटकारते ही वे चुप्पी साध लेते हैं. हम आशा करते हैं कि इस तरह के घृणा फैलाने वाले अभियानों का वैचारिक और कानूनी दोनों स्तरों पर मुकाबला किया जायेगा और भारतीय संविधान इसमें हमारी सहायता करेगा. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

May 07, 2020

Hindi Article- Countering Hate: Promoting Love


नफरत के ज़हर की नहीं, प्रेम की खुशबू की ज़रुरत है हमें हमारी दुनिया पर कोरोना वायरस के हल्ला बोलने के बाद सभी को उम्मीद थी कि इस अदृश्य शत्रु से लडाई हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी और इस लडाई को नस्ल, धर्म आदि की दीवारों से ऊपर उठ कर लड़ा जायेगा. परन्तु यह दुखद है कि भारत में स्थितियां इतनी ख़राब हो गईं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ तक को यह कहना पड़ा कि इस वैश्विक आपदा से लड़ाई में नस्ल और धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कोरोना वायरस धर्म या जाति की दीवारों को नहीं देखता और आरएसएस मुखिया ने कहा कि कुछ लोगों की गलतियों के लिए पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए. परन्तु तब तक जो नुकसान होना था वह हो चुका था. भारत में सबसे पहले तबलीगी जमात पर निशाना साधा गया. इस संस्था की कुछ भूलों को कोरोना के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया. यही नहीं, कई तरह की झूठी खबरें भी प्रचारित की गईं. यह कहा गया कि जमात के सदस्य डॉक्टरों और नर्सों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं और इस रोग को फैलाने के लिए सब्जियों और फलों पर थूक रहे हैं. सांप्रदायिक तत्वों को इससे भी संतोष नहीं हुआ. मुसलमान व्यापारियों और दुकानदारों का बहिष्कार करने का आव्हान किया गया और आवासीय परिसरों में ठेले पर सामान बेचने वाले मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही गई. एक अन्य घटना में मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर हजारों लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो गई. इसका कारण थी यह अफवाह कि वहां से कुछ ट्रेनें रवाना हो रही हैं, जो प्रवासी मजदूरों को उनके गृह प्रदेशों तक ले जायेंगीं. संयोगवश, यह स्टेशन एक मस्जिद के पास है और इसका लाभ उठाते हुए गोदी मीडिया ने इस घटना का भी साम्प्रदायिकीकरण कर दिया. इससे फिज़ा में घुली नफरत का रंग और गहरा हो गया. तीसरी बड़ी घटना थी महाराष्ट्र में पालघर के नज़दीक दो साधुओं और उनके ड्राईवर की लिंचिंग. इन तीनों को इस शक में मार डाला गया कि वे बच्चे चुराने वाली गैंग के सदस्य हैं. इस घटना के बारे में भी कहा गया कि इसे मुसलमानों ने अंजाम दिया है. यह सफ़ेद झूठ है. इस मामले में रिपब्लिक टीवी के अर्नबब गोस्वामी ने आसमान सिर पर उठा लिया और यहाँ तक कह डाला कि सोनिया गाँधी इस घटना से खुश हुई होंगीं. गोस्वामी ने सोनिया गाँधी के इतालवी मूल का हवाला भी दिया. गोस्वामी को अपनी इस बेजा टिप्पणी के लिए क़ानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है. परन्तु यह एक अलग कहानी है. देश में जिस तरह से मुसलमानों से दूर रहने और उनका बहिष्कार करने की बातें कही जा रही हैं उनसे जर्मनी में यहूदी व्यापारियों के बहिष्कार के आव्हान की याद आना स्वाभाविक है. इस आव्हान के बाद ही जर्मनी में ‘फाइनल सोल्यूशन’ का नारा दिया गया था. हमारे समाज में मुसलमानों, और कुछ हद तक ईसाईयों, के बारे में तरह-तरह के मिथकों और पूर्वाग्रहों का बोलबाला है. इन समुदायों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली एक बहुत बड़ी मशीनरी देश में सक्रिय है. यह मशीनरी पिछले कुछ सालों में और मज़बूत हुई है. इस सोच की जडें काफी गहरी हैं और इसे सांप्रदायिक तत्वों ने काफी मेहनत से खाद-पानी दिया है. हमारे लिए यह कल्पना करना ही मुश्किल था कि कोविड 19 जैसे मानवीय त्रासदी का उपयोग भी विभाजनकारी रेखाओं को और गहरा करने के लिए किया जा सकता है. हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा में रचे-बसे हजारों प्रशिक्षित लोगों की एक विशाल सेना मुसलमानों की नकारात्मक छवि गढ़ने और उनके बारे में पूर्वाग्रहों का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है. इस सेना ने हमारे समाज के सभी वर्गों में अपनी पैठ बना ली है. भाजपा के पूर्व अवतार जनसंघ के मोरारजी देसाई के नेतृत्व और जयप्रकाश नारायण के संरक्षण में गठित जनता पार्टी सरकार में शामिल होने के बाद, बाबरी मस्जिद के विध्वंसक लालकृष्ण आडवाणी को केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री की ज़िम्मेदारी दी गई थी. तभी से मीडिया में सांप्रदायिक तत्वों का बोलबाला बढ़ना शुरू हुआ. शाहबानो मामले में मुस्लिम नेतृत्व के एक तबके की भारी भूल ने इन तत्वों को मसाला दिया. इसके बाद तो फिरकापरस्तों ने मुड़कर नहीं देखा. देश के मध्यकालीन इतिहास को तोड़मरोड़ कर उसका इस्तेमाल आज के मुसलमानों का दानवीकरण करने के लिए किया गया. फिर आए लव जिहाद, घरवापसी और पवित्र गाय जैसे मुद्दे. मुसलमानों को समाज के हाशिये पर धकेल दिया गया और उनके विरुद्ध हिंसा का ग्राफ ऊपर जाने लगा. मुसलमान अपने मोहल्लों में सिमटने लगे और उनमें बढ़ते असुरक्षा के भाव ने उन्हें मौलानाओं की गोदी में बैठा दिया. मौलानाओं ने इस्लाम की शिक्षाओं की संकीर्ण और पुरातनपंथी व्याख्या करनी शुरू कर दी और इससे गोदी मीडिया को पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने का अवसर मिल गया. जो मुसलमान इस्लाम की सच्ची शिक्षाओं की बात करते थे, जो मुसलमान मानवीय मूल्यों के हामी थे, जो मुसलमान उदारवादी थे, उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बन कर रह गई. फिर आया सोशल मीडिया, ट्रोल आर्मी और फेक न्यूज़. आज मुसलमानों के खिलाफ नफरत भड़काना इसलिए आसान हो गया है क्योंकि उनके प्रति पूर्वाग्रह पहले से ही लोगों के दिमागों में भरे हुए हैं. इसी पृष्ठभूमि में कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने एक थिंकटैंक का गठन किया है. इसका नाम है ‘इंडियन मुस्लिम्स फॉर प्रोग्रेस एंड रिफॉर्म्स’. वे एक साथ कई स्तरों पर काम करने का इरादा रखते हैं. हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि वे इस समुदाय को सुधार की दिशा में ले जाएंगें और मुस्लिम युवकों के लिए रोज़गार के अवसरों का सृजन करने में मदद करेंगे. इसके साथ ही वे मीडिया द्वारा मुसलमानों का दानवीकरण करने का प्रयासों का मुकाबला भी करेंगे. हम उनसे यह अनुरोध भी करना चाहेंगे कि वे समाज में व्याप्त नफरत की नींव पर भी प्रहार करें. इस सन्दर्भ में लब्धप्रतिष्ठ अध्येताओं जैसे डॉ. असग़र अली इंजीनियर, के.एन. पणिक्कर और अनेक इतिहासविदों, जिन्हें वामपंथी इतिहासविद कहा जाता है, ने अत्यंत उपयोगी काम किया है. उन्होंने इतिहास के वैज्ञानिक और तार्किक अध्ययन पर जोर दिया है - उस इतिहास पर जो विविधता का उत्सव मनाता है. उन्हें गाँधी के विचारों और कार्यों पर भी ध्यान देने की ज़रुरत है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधीजी ने इस देश में अंतरसामुदायिक रिश्तों को प्रेम और सौहार्द पर आधारित बनाने में महती भूमिका अदा की थी. इस काम में जवाहरलाल नेहरु की ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ और उस पर आधारित ‘भारत एक खोज’ नामक टीवी धारावाहिक भी मददगार हो सकता है. कुछ और पीछे जाने पर हम भक्ति (कबीर, तुकाराम, नरसी मेहता आदि) और सूफी (निजामुद्दीन औलिया, गरीब नवाज़ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती आदि) संतों से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं, जिन्होंने साँझा धार्मिक परम्पराओं पर जोर दिया था. थिंक टैंक को देश में काम रहे ऐसे संगठनों की मदद भी लेनी चाहिए जो इस दिशा में विचार और काम कर रहे हैं. बंधुत्व को बढ़ावा दिए बगैर हमारे देश में प्रजतान्त्र जिंदा नहीं रह सकेगा. हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अगर अल्पसंख्यकों का दानवीकरण रोका नहीं गया तो यह नफरत हमें किसी दिन हिंसा के ऐसे दावानल में झोंक देगी, जिसमें हमारा बुरी तरह से झुलसना अपरिहार्य होगा. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

May 06, 2020

India: The Majoritarian Bargain | Joel Lee

India Today

The Majoritarian Bargain

No other book exposes so viscerally the instrumentalism of the RSS effort to woo the disprivileged castes even while nurturing casteism deep in its savarna heart.

The Story of a Dalit in the RSS
When the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) held a much-publicised three-day lecture series in New Delhi in September 2018, atte­ndees were greeted by two gigantic free-standing portraits. On one side, unsurprisingly, rose K.B. Hedgewar, founding sarsanghchalak of the RSS and an early exponent of its ideology of Hindu supremacy. More startling was the occupant of the adjoining panel: Bhimrao Ambedkar, the 20th century’s most formidable and tren­chant critic of that very ideology. The display implied that Dr Ambedkar somehow approved of, or participated in, the Hindu nationalist project of which, in fact, virtually his entire oeuvre and political career were a systematic condemnation.
If this effort to appropriate Ambedkar, and with him, Dalits, seems incredible, Bhanwar Meghwanshi’s potent insider account of the RSS reveals that attempts like these are but the polished tip of a vast and menacing iceberg. In I Could Not Be Hindu: The Story of a Dalit in the RSS, Meghwanshi guides the reader into the parallel universe of those RSS schools, shakhas and camps that target the youth of disprivileged castes for indoctrination and training in militant ethnoreligious nationalism. In these institutions, the inculcation of disregard for historical fact in favour of majoritarian myth is merely a first step. Ultimately, the RSS achieves its aims through acts of intimidation and violence against Muslims and Christians, acts orchestrated by the Sangh’s savarna leadership, but carried out, in an irony painfully explored throughout the memoir, by backward caste and Dalit volunteers stigmatised by the very religion they are ostensibly defending.
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One could hardly ask for a more credentialled eyewitness. First inducted into the RSS by his sixth-standard geography teacher, Meghwanshi was by the age of 15 a battle-scarred karsevak with jail time, street fights with Muslims, and bruises from the lathis of the Uttar Pradesh police to his credit. In his home district of Bhilwara, Rajasthan, he swiftly ascended the Sangh’s ranks to become, before the age of 20, pramukh or chief of the city office. He received weapons training, lathis, knives, Molotov cocktails, from his RSS mentors. In a fast-paced narrative delivered in bold, straightforward prose, Meghwanshi describes the culture of militancy and mutual respect, he points to the practice of volunteers addressing one another with the honorific “ji” as especially powerful for youth accustomed to being treated with contempt, that attracted him to the Sangh.
The mutual respect, however, proves false. The turning point in the narrative comes when, following a joint RSS-VHP function in his village in honour of “martyred” karsevaks whose ashes are being carried through the region, Meghwanshi has his family laboriously prepare and pack a dinner to feed the honoured assembly of sants and sadhus, only to discover the next morning that his Hindutva mentors dumped the entire meal on the roadside after leaving his village, having never intended to eat food cooked by Dalit hands. Devastated, Meghwanshi seeks redress from higher RSS authorities, only to find that the bad faith was not a local aberration, but the institutional norm.
From a Hindutva foot soldier, Megh­wanshi transforms in the following years into an Ambedkarite truth seeker committed to anti-caste struggle and interreligious bridge-building. As a student leader, teacher, journalist and activist with the Mazdoor Kisan Shakti Sangathan, he takes part in a series of grassroots struggles, over temple entry, mosque destruction and trident-distribution in Rajasthan, the Gujarat pogrom, and more, that pit him against his erstwhile RSS confederates and make the book a chronicle not just of an extraordinary life but of three consequential decades of the nation’s history.
No other book exposes so viscerally the instrumentalism of the RSS effort to woo the disprivileged castes even while nurturing casteism deep in its savarna heart. In the present moment, when the Faustian bargain that Hindutva extends to Dalits and backward castes has never been more politically salient, the lessons of Meghwanshi’s searing memoir could not be more urgent.
Joel Lee is assistant professor of anthropology, Williams College, Massachusetts
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