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October 23, 2020

Hindi Article- Diversity: Promotes or Hinders Nation Building?

विविधताः राष्ट्रनिर्माण में सहायक या बाधक -राम पुनियानी एक समाचार के अनुसार, ब्रिटेन के चांसलर ऑफ़ द एक्सचेकर ऋषि सुनाक ने 17 अक्टूबर 2020 को 50 पेन्स का एक नया सिक्का जारी किया. सिक्के को ‘डायवर्सिटी क्वाइन’ का नाम दिया गया है और इसे ब्रिटेन के बहुवादी इतिहास का उत्सव मनाने और देश के निर्माण में अल्पसंख्यकों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करने के लिए जारी किया गया है. सिक्के पर अंकित है ‘डायवर्सिटी बिल्ट ब्रिटेन (ब्रिटेन का निर्माण विविधता ने किया)’. इस सिक्के की पृष्ठभूमि में है ‘वी टू बिल्ट ब्रिटेन (हमारा भी ब्रिटेन के निर्माण में योगदान है)’ समूह का अभियान. यह सिक्का नस्लीय अल्पसंख्यकों के ब्रिटेन के निर्माण में योगदान को सम्मान देने की प्रस्तावित श्रृंखला की पहली कड़ी है. ब्रिटेन में रहने वाले अल्पसंख्यकों, जिनमें दक्षिण एशिया के निवासियों की बड़ी संख्या है, ने इस देश को अपना घर बना लिया है और वहां की प्रगति व कल्याण में अपना भरपूर योगदान दिया है. यह अभियान सेम्युल हटिंगटन के ‘‘सभ्यताओं के टकराव’’ के सिद्धांत का नकार है. सोवियत संघ के पतन के बाद प्रतिपादित इस सिद्धांत के अनुसार, दुनिया में विभिन्न सभ्यताओं के बीच टकराव अवश्यंभावी है. “मेरी यह मान्यता है कि आज के विश्व में टकराव का आधार न तो विचारधारात्मक होगा और ना ही आर्थिक. मानव जाति को बांटने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक है संस्कृति और टकराव का मुख्य कारण होगी. यद्यपि राष्ट्र-राज्य विश्व के रंगमच के मुख्य पात्र बने रहेंगे परंतु अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में संघर्ष, मुख्य रूप से अलग-अलग सभ्यताओं वाले राष्ट्रों और उनके समूहों के बीच होगा. सभ्यताओं के बीच टकराव, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर हावी रहेंगें. सभ्यताओं की सीमा रेखाएं ही आने वाले दिनों में युद्ध का मोर्चा बनेंगीं. डब्लूटीसी पर 9/11 के हमले के बाद से इस सिद्धांत का जलवा पूरी दुनिया में कायम हो गया. ओसामा-बिन-लादेन ने इस हमले को जेहाद बताया. अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले को जार्ज बुश ने क्रूसेड बताया था. ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने पश्चिम एशिया के देशों पर हमले के पीछे ‘दैवीय कारण’ बताए थे. सभ्याताओं के टकराव के सिद्धांत ने अमरीका और उसके सहयोगी देशों के सैन्य अभियानों को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया. ये हमले दरअसल केवल और केवल कच्चे तेल के उत्पादक क्षेत्रों पर कब्जा जमाने के लिए किए गए थे. सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत ने अमरीका और उसके साथियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कानून के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन को औचित्यपूर्ण ठहराने में मदद की. पहले साम्राज्यवादी देशों ने दुनिया के कमजोर मुल्कों को अपना उपनिवेश बनाकर उनका खून चूसा. अब यही काम वे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर काबिज होकर अंजाम दे रहे हैं. इसके विरूद्ध विचारधारात्मक स्तर पर एक बहुत मौंजू टिप्पणी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ के. आर. नारायणन ने की थी. उन्होंने कहा था, “सभ्यताएं नहीं टकरातीं, बर्बरताएं टकराती हैं”. तत्समय संयुक्त राष्ट्र संघ का नेतृत्व कोफी अन्नान के हाथों में था जो उसके महासचिव थे. उन्होंने एक उच्चस्तरीय अंतर्राष्ट्रीय समिति का गठन किया जिसमें विभिन्न धर्मों और राष्ट्रों के प्रतिनिधि शामिल थे. इस समिति से कहा गया कि वह आज के विश्व को समझने के लिए एक नई दृष्टि का विकास करे और विभिन्न सभ्यताओं, संस्कृतियों और देशों के बीच शांति बनाए रखने के उपायों के संबंध में अपनी सिफारिशें दे. इस समिति ने अपनी सिफारिशों को जिस दस्तावेज में संकलित और प्रस्तुत किया, उसका शीर्षक अत्यंत उपयुक्त था – ‘एलायंस ऑफ़ सिविलाईजेशन्स (सभ्यताओं का गठजोड़)’. इस वैश्विक अध्ययन के संबंध में दुर्भाग्यवश दुनिया में अधिक लोग नहीं जानते. यह दस्तावेज बताता है कि किस प्रकार लोग एक स्थान दूसरे स्थान, एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र गए और उन्होंने अपने नए घरों को बेहतर और सुंदर बनाने में अपना योगदान दिया. जहां तक भारत का प्रश्न है, विविधता हमेशा से हमारी सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा रही है. भारत में ईसाई धर्म का प्रवेश आज से 1900 वर्ष पूर्व पहली सदी ई. में ही हो गया था. भारत में इस्लाम सातवीं-आठवीं सदी में मलाबार तट के रास्ते आया. इसे अरब व्यापारी भारत लाए. बाद में जाति और वर्ण व्यवस्था के पीड़ितों ने बड़ी संख्या में इस्लाम को अंगीकार कर लिया. जिन मुस्लिम आक्रांताओं ने उत्तर-पश्चिम से भारत में प्रवेश किया, वे यहां अपने धर्म का प्रचार करने नहीं वरन् इस देश पर कब्जा जमाने और यहां की संपदा को लूटने के लिए आए थे. बौद्ध धर्म भारत से विभिन्न दक्षिण एशियाई देशों में गया. बड़ी संख्या में भारतीय दूसरे देशों में जा बसे. इसके पीछे मुख्यतः आर्थिक कारण थे. इंग्लैंड में आज भारतीयों की खासी आबादी है. अमरीका, आस्ट्रेलिया और कनाडा में भी बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं. शुरूआती दौर में भारत से कई प्रवासी मारिशस, श्रीलंका और कैरेबियन देशों में गए. प्रवासी समुदाय अपने मूल देश को पूरी तरह विस्मृत नहीं कर पाते परंतु इसके साथ ही वे अलग-अलग तरीकों से अपने नए देश के समाजों के साथ जुड़ते भी हैं. आज खाड़ी के देशों में काफी बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं. भारत के साम्प्रदायिक तत्व, विदेशों में रहने वाले भारतीयों के भारत से जुड़ाव की प्रशंसा करते नहीं अघाते परंतु वे ईसाई धर्म और इस्लाम को विदेशी बताते हैं! सच तो यह है कि हिन्दू धर्म में भी अनेकानेक विविधताएं हैं. भारतीय संस्कृति विविधवर्णी है जिस पर भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के निवासियों, अलग-अलग धर्मों के मानने वालों और अलग-अलग भाषाएं बोलने वालों का प्रभाव है. हमारा साहित्य, हमारी कला, हमारी वास्तुकला, हमारे संगीत सभी पर विविध सांस्कृतिक धाराओं का प्रभाव है. हमारे देश में अलग-अलग सभ्यताओं और संस्कृतियों के लोग मिलजुलकर रहते आए हैं. अक्सर मिलीजुली संस्कृति वाले देशों को ‘मेल्टिंग पॉट (आपस में घुलकर अपनी अलग पहचान खो देना)’ बताया जाता है. मेरे विचार से इसके लिए एक बेहतर शब्द है ‘सलाद का कटोरा’. सलाद अलग-अलग सब्जियों से मिलकर बनता है परंतु उसके सभी घटक अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं. हमारा साहित्य भी हमारे समाज और हमारी संस्कृति को प्रतिबिंबित करता है. हमारे वरिष्ठ साहित्यकार भी भारत के इसी स्वरूप पर जोर देते आए हैं. विविधता हमारे स्वाधीनता संग्राम का भी आधार थी जिसने समाज के विभिन्न तबकों को एक मंच पर लाया. इसके विपरीत, साम्प्रदायिक धाराएं उर्दू-मुस्लिम-पाकिस्तान और हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान जैसी संकीर्ण अवधारणाओं को बढ़ावा देती आई हैं. तथ्य यह है कि अनेकता में एकता ही हमारे देश की असली ताकत है. पंडित नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ इसी विविधता का उत्सव मनाती है. आज हमें ब्रिटेन से यह सीखने की आवश्यकता है कि राष्ट्रनिर्माण में अल्पसंख्यकों के योगदान को किस तरह मान्यता दी जाए. भारत के लिए भी यह जरूरी है कि वह अपनी विविधता को स्वीकार करे, उसे सम्मान दे और उसे और मजबूत और गहरा बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करे. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

October 20, 2020

India: On How 736 Sangh Parivar NGOs qualified for government funds, subsidised rations during the COVID-19 lockdown | Sagar - 11 July 2020, The Caravan

The Caravan - 11 July 2020

736 Sangh Parivar NGOs qualified for government funds, subsidised rations during the COVID-19 lockdown

by Sagar 

As of 13 May, at least 736 NGOs affiliated to the Rashtriya Swayamsevak Sangh featured among a list of organisations enlisted by the central government for relief interventions during the ongoing lockdown to control the novel coronavirus pandemic. All these entities come under the umbrella of the Rashtriya Sewa Bharati, which is a registered trust, and works in the fields of education, health and “self-reliance,” according to its website. The RSB’s NGOs are among the 94,662 NGOs which are working as “COVID warriors” with district administrations across the country since the first week of April, and are being monitored by a group of bureaucrats, constituted by the home secretary. Owing to this enlistment, the RSB’s NGOs became entitled to funds from the State Disaster Relief Fund, or SDRF—set up under the Disaster Management Act, 2005 for states to use during a crisis—and for buying subsidised foodgrains from the Food Corporation of India, a central government body.

In an ongoing series, The Caravan tracked the RSS’s relief interventions since the beginning of the lockdown. As demonstrated in the first report, the Sangh, a three-time banned organisation, employs disaster-relief interventions, such as the ongoing pandemic, to gain influence and acceptability for its foundational aspiration—the formation of the Hindu Rashtra. Consequently, the RSB’s organisations’ use of government funds and resources to carry out relief work is significant because the RSS has never publicly acknowledged financial support from any government for its disaster-relief work.

As of 2014, the RSB’s roster included 57,000 social and economic projects which were being executed by at least 928 NGOs registered under its domain. All these organisations are listed on the RSB’s website. The central government’s list of enlisted NGOs is collated on a portal called NGO-Darpan, run by the Niti Aayog, the central government’s planning body. The RSB’s website claims that all its organisations are voluntary and independent, and it is only ideologically attached to the RSS. However, the RSB’s own five-yearly report, last published in 2014, has a section by Bhaiyyaji Joshi, the RSS’s sarkaryawaah, or second in command. Joshi wrote that these sewa bharati units “are independent but being supported and inspired by RSS.” He further noted, “The workers of these organisations are connected with the local RSS pattern … None of the service programmes work with RSS banners though these works are directed by swayamsevaks.” Senior members of the RSB’s organisational hierarchy have held similarly high positions in the Sangh, too.

According to Sankar Das, a bauddhik pramukh—intellectual head—of Assam, the Sangh has “46 national platforms,” which include the RSS’s labour wing, the Bharatiya Mazdoor Sangh and the student wing, the Akhil Bharatiya Vidhyarthi Parishad, among others. It should be noted that there seems to be no consensus among scholars as to the exact number of organisations which come under the ambit of the Sangh. Since the Sangh is neither a registered organisation nor does it pay taxes, this has helped it avoid scrutiny of its finances and those of its affiliates, collectively referred to as the Sangh Parivar. Instead, the mythos of the Sangh is based on its voluntary nature—the RSS’s own literature and outreach has meticulously created and projected an image of an organisation that is “self-reliant” and does not take money from external sources. An oft-repeated refrain is that the RSS raises its money from voluntary members, called swayamsevaks, in the form of a donation known as “gurudakshina”—a gift given to honour a guru.

I spoke to around two dozen RSS members, including those associated with the RSB, from 11 states. Speaking about the Sangh’s funding, one of the RSB’s members gave me a response that the rest of them echoed: “Khud se kartey hain ya kabhi kabhi samaj ke logon se madad mil jati haiWe do it ourselves or sometimes we get help from people in the society. There was no mention of any funding from the government.

In addition, the RSB’s website offers its NGOs to private corporations as “avenues” to spend their CSR funds. In fact, a week into the second phase of the lockdown, the Niti Aayog had “urged” private companies to consider the NGOs registered on the NGO-Darpan portal for their CSR spending. Under the existing law, a private corporation has to spend two percent of its profit on social projects, either through its own non-profit foundation or independently registered non-profit organisations. Earlier, on 23 March, the ministry of corporate affairs had allowed spending on COVID-related activities to be counted as CSR. Consequently, all of the NGOs on the Niti Aayog portal, including the RSB’s, qualified for these CSR funds.

According to a notification by the ministry of home affairs, the decision to engage NGOs and support them with government resources and money was formulated four days after the lockdown began on 25 March. The lockdown, enforced without any assurances on food, wage and shelter security, forced thousands of migrant workers living in the cities to return to their homes on foot, and severely impacted the most vulnerable segments of Indian society. By 28 March, at least 12 lakh migrants were grounded at various state borders after the ministry of home affairs ordered the director generals of police of all states to stop all movement of migrants. On 29 March, to deal with the situation, the government formed 11 “empowered groups” headed by bureaucrats attached to the central government to prepare a “well planned and coordinated emergency response” system against the outbreak. One of the empowered groups, EG 6, was headed by Amitabh Kant, the chief executive officer of Niti Aayog. The mandate of the group was “coordinating with the private sector, NGOs and international organisations for response related activities.”

The EG 6’s first meeting, on 5 April, was chaired by Kant, and the subsequent press release said, “CEO NITI Aayog has written to over 92000 NGOs/ CSOs registered on the Darpan portal of NITI Aayog, appealing them to assist the government.” The assistance sought was wide-ranging and included delivery of essential services to vulnerable populations, awareness drives, and community kitchens, among others. The notice also said that Kant had written to “all Chief Secretaries urging them to instruct the local administration at the district level to utilise the physical and human resources made available by NGOs and CSOs.”

Five days later, the prime minister Narendra Modi chaired a review meeting of all the empowered groups, which was also attended by the national security advisor, Ajit Doval, and the principal secretary, PK Mishra. According to the update on Modi’s website, Mishra had suggested that “coordination with NGOs at district level be done to avoid overlaps and ensure efficacious utilization of resources.”

A day after Modi’s review, on 11 April, the Food Corporation of India, which comes under the ministry of consumer affairs, food and public distribution, released a circular on supplying foodgrains to NGOs. The notice stated that “in view of the extraordinary situation … it has been decided that as an one time measure, charitable/non-governmental organizations running relief camps/providing food to needy people may be provided foodgrain … without the need for registration/empanelment with FCI or the need to participate in e-auction.”

Two weeks later, on 25 April, a group of ministers, the highest executive body set up by Modi to monitor the administration’s response system, also held its review meeting. This GoM was formed on 3 February, and was headed by Harsh Vardhan, the union minister for health and family welfare. According to a press release, Kant told the GoM, “These NGOs are supported by the States by allotting funds from SDRF funds and by FCI who is providing the foodgrains at subsidized cost.”

The very next day, Akhilesh Yadav, the president of the Samajwadi Party and a former chief minister of Uttar Pradesh, accused the RSS of receiving food from the government but distributing it as its own relief material. “BJP governments are doing politics instead of working honestly. There is no difference between community kitchen and the storage of RSS in the state. The RSS is claiming the food items received from voluntary organisations and government institutions as its own and then distributing them in the Modi bag to some BJP families.” Yadav is one of the few senior politicians who have publicly criticised the RSS’s relief work during the lockdown. When I posed this allegation to Ramashish Singh, an RSS pracharak—full-time member—based out of Varanasi, he evaded it. He is also a member of the Prajna Pravah, a Sangh affiliate that describes its mission as “incorporating the theme of nationalism in spiritual terms.” Instead, Ramashish told me, “What credibility or legitimacy does Akhilesh Yadav have?”

However, a senior central tax official, who chose to remain anonymous, told me that even though the RSB organisations can recruit volunteers of their choice, including swayamsevaks, to execute their COVID-related programmes and their regular social projects, one cannot rule out the possibility that the government funds given to sewa bharati units were used by the RSS. The RSB’s own annual report of 2014 categorically states that the sewa bharti’s projects are designed and supervised by local RSS administrators, and executed by swayamsevaks, among other members. 

On 4 May, Kant chaired another meeting of EG 6, which included details of the entire plan implemented by the group. A press release about the meeting said, “The EG 6 is monitoring and coordinating with NGO and CSO networks in all State / Union Territories and with 700 District Magistrates in the country on a real time basis to fight the spread of COVID-19. The mobilisation of these 92000 NGOs has resulted in commendable outcomes.” It had details of foodgrains and their prices, for NGOs to procure and distribute. According to the statement, the EG 6 had requested all the chief secretaries “to appoint State-level Nodal Officers to coordinate with all NGOs and resolve their issues apart from leveraging their resources and networks.”

Currently, there is no way to quantify the actual transaction of money between the SDRFs and the government-enlisted NGOs since the disbursals of SDRFs during the lockdown are not in the public domain. The data on the amount of subsidised food sold to these NGOs during the pandemic is also not public.

When I spoke to the national general secretary of the RSB, Shrawan Kumar, and asked him about the funds coming from the government, he denied taking any money from the administration. He said, “I do not know about SDRF.” Kumar said that “all our state units function independently. It’s possible that the state unit knows about it and they are doing it on their own, since all our units work independently.” He agreed that “yes, we got the FCI circular and we told all our state units to use this scheme.” In addition, Kumar said that while he himself had not enlisted the RSB’s NGOs with the government but “RSB is an umbrella organisation. Each state works at its own level. They keep doing things independently; maybe one of them did this.”

While Kumar denied any knowledge of SDRF, D Vijayan, the president of the Kerala unit of the RSB, told me that they had availed of both, the FCI’s subsidised foodgrains and the SDRF. He said “we are waiting for the [SDRF] funds” and had submitted the necessary documentation for the funds to be released to them.

Kumar also insisted that “we are a registered trust and follow all the legal requirements.” Since it is registered, as per the law, RSB units can raise funds from people and private corporations. Its website states: “In order to promote its CSR activities, the company needs to identify social entrepreneurs, self-help groups or an individual from an impact and influence area and support them by impact investment. Rashtriya Sewa Bharti is an impactful avenue for channelizing the corporate CSR resources.”

It should be noted here that in its 95-year history, the RSS has never registered itself. In September 2018, during an  address at the Vigyan Bhawan in the national capital, the RSS chief, or sarsanghchalak, Mohan Bhagwat, gave a rather convoluted reason for why the Sangh is not registered or does not pay taxes. “When the Sangh started, the government was not of independent Bharat. It was 1925. It started and went on like that,” he said. “After Independence also it went on like that. In all the laws after Independence, there was no such law that every organisation has to get itself registered. And by law, the Sangh has a status—Body of Individuals. As per this status, by law, we don’t have to pay tax.”

Irrespective of the lack of a money trail, it would not be amiss to say that the RSB and the RSS are conjoined at more than an ideological level. Rishipal Dadwal, the current vice-president of the RSB, is also a rashtriya sangathan mantri, or national organisational secretary, of the RSS. In February 2019, when the former Samajwadi Party leader Amar Singh donated a part of his family property to the RSB, Dadwal was present during the registration of the property in Lucknow. Until 2018, Parag Abhyankar, the present sampark adhikari, or communication liaison of the Rashtriya Sewa Bharati, had been a prant pracharak –a full-time member who handles state-wide activities—for the RSS’s Malwa prant. The RSS’s state boundaries are different from the union map. An RSS publication titled, Rashtriya Swayamsewak Sangh: Ek Parichay, says that as per the Sangh’s administrative divisions, India has 41 states and seven union territories. 

Kumar told me that his organisation implements social-welfare projects because it is in the “interest of the nation” and part of “Indian culture.” All the two dozen office-bearers of the RSS and the RSB that I spoke to used a similar vocabulary when questioned about the Sangh’s role during disasters. All of them invoked the concept of “sewa”—service—as an essential pillar of the “nation” and “nation-building.” Their notion of “nation” was unerringly conflated with being “Hindu.” Most of them studiously avoided any reference to fundraising for the RSB’s nine-hundred plus NGOs, insisting that “people from the society” chipped in with whatever money and resources they could.

The Caravan compared the database of NGOs enlisted by the government, which is available in the Niti Aayog-run portal, NGO-Darpan, with the list of organisations registered under the Rashtriya Sewa Bharti. The RSB’s website has the details of at least 928 NGOs. Duplication or repeating entries were eliminated by cross-matching emails and mobile numbers from the NGO-Darpan database. A total of 736 RSB’s organisations, spread across 25 states, were found on the Darpan database. Uttar Pradesh, Gujarat, Karnataka and Kerala accounted for the maximum number of RSB’s NGOs enlisted with the government.

This is the second report of a series on the Rashtriya Swayamsewak Sangh’s relief interventions during the COVID-19 lockdown. You can read the first and third report, here and here, respectively.

 Sagar is a staff writer at The Caravan.

October 16, 2020

Hindi Article-Communaists, Indian Constitution and Muslim Minorities

फिरकापरस्त, भारतीय संविधान और मुस्लिम अल्पसंख्यक -राम पुनियानी एक वर्ष पूर्व (अक्टूबर 10, 2019) आरएसस के मुखिया मोहन भागवत ने कहा था कि भारत में रहने वाले मुसलमान हिन्दुओं के कारण दुनिया में सर्वाधिक सुखी हैं. अब वे एक कदम आगे बढ़कर कह रहे हैं कि यदि मुसलमान कहीं संतुष्ट हैं तो केवल भारत में. वे इसके आगे एक बात और कहते हैं, “यदि दुनिया में ऐसा कोई देश है जिसमें वह विदेशी धर्म - जिसके मानने वालों ने वहां शासन किया हो - अब फल-फूल रहा है तो वह भारत है.” यही नहीं, वे आगे कहते हैं, “हमारा संविधान यह नहीं कहता कि सिर्फ हिन्दू यहां रह सकते हैं या यहां सिर्फ हिन्दुओं की बात सुनी जाएगी और यदि आपको यहां रहना है तो हिन्दुओं की उच्चता को स्वीकार कर रहना होगा. हमने उन्हें रहने के लिए जगह दी. हमारे देश की यही प्रकृति है और इस प्रकृति का नाम हिन्दू है.” एक इतिहासविद का मुखौटा पहनते हुए उन्होंने यह भी कहा कि “अकबर के विरूद्ध लड़े गए युद्ध में राणा प्रताप की सेना में मुसलमान भी शामिल थे. यह इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि जब भी भारत की संस्कृति पर हमला हुआ तब सभी धर्मों के मानने वालों ने एक होकर उसका मुकाबला किया”. उन्होंने राम मंदिर को हमारे देश के राष्ट्रीय मूल्यों और चरित्र का प्रतीक बताया. ये सब बातें आरएसएस, जो देश के अन्दर और देश के बाहर भी हिन्दू सम्प्रदायवाद का संरक्षक है, की आलोचना को भटकाने का प्रयास हैं. पिछले कई दशकों से मुसलमानों की स्थिति में लगातार गिरावट आ रही है. इस गिरावट के लिए राम मंदिर आंदोलन के दौरान निकाली गई यात्रा, गौमांस के नाम पर लिंचिंग, लव जेहाद के नाम पर दी जा रही धमकियां और घर वापसी का अभियान जिम्मेदार हैं. अभी हाल में लोकतांत्रिक तरीके से चलाये जा रहे शाहीन बाग आंदोलन का उपयोग मुसलमानों को आतंकित करने के लिए किया गया. इस आंदोलन के बाद हुई हिंसा में बड़ी संख्या में मुसलमानों की जानें गईं और उनके धार्मिक स्थलों और संपत्ति को भारी नुकसान हुआ. साम्प्रदायिकता को आज कमज़ोर वर्गों को पीड़ा पहुँचाने वाली विचारधारा के रूप में देखा जा रहा है और इसलिए अब श्री भागवत भारतीय संविधान को याद कर रहे हैं. भागवत उस संविधान को याद कर रहे हैं जिसकी संघ परिवार के नेताओं ने हमेशा निंदा की है और उसे हमारे देश के लिए इसलिए अनुपयुक्त बताया है क्योंकि उसका आधार विदेशी मूल्य हैं. इसके विपरीत, शाहीन बाग आंदोलन का मुख्य आधार भारतीय संविधान की उद्देशिका थी. क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि भारतीय संविधान बहुवादी और लोकतंत्रात्मक भारत चाहता है जबकि आरएसएस भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है. भारतीय संविधान की नजर में कोई धर्म न तो विदेशी और न देशी. सभी धर्म सर्वव्यापी हैं और इसलिए संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म को मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है. हमारा संविधान हमें यह आजादी भी देता है कि कि हम किसी भी धर्म को न मानें. आरएसएस के सरसंघचालक शायद यह नहीं जानते कि आजादी के आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता और धर्म के बीच कोई संबंध नहीं था. हमारे देश के आजादी के आंदोलन में विभिन्न धर्मों को मानने वालों और किसी भी धर्म को न मानने वालों ने कंधे से कन्धा मिलाकर भाग लिया था. शायद सरसंघचालक यह भी नहीं जानते होंगे कि दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों में बुद्ध धर्म, वहां का मुख्य धर्म है. बौद्ध धर्म की उत्पत्ति भारत में हुई थी परंतु आज वह अन्य देशों का मुख्य धर्म है. भागवत के संगठन का मुख्य वैचारिक आधार इतिहास की साम्प्रदायिक विवेचना है. जब वे यह कहते हैं कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए मुसलमानों ने अकबर के विरूद्ध महाराणा प्रताप का साथ दिया था तब वे इतिहास की विकृत व्याख्या की पराकाष्ठा कर रहे होते हैं. राणा प्रताप किस तरह भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते थे? वे तो केवल मेवाड़ के राजा थे. अकबर और राणा प्रताप के बीच हुए युद्ध का भारतीय संस्कृति से क्या लेनादेना है? अकबर क्या सभी मुस्लिम राजा, जिन्होंने इस देश पर शासन किया, वे इस देश का अभिन्न भाग बन गए. विशेषकर अकबर तो विभिन्न धार्मिक आस्थाओं वाले समाज के हिमायती थे और शायद इसलिए उन्होंने सुलह-ए-कुल अर्थात विभिन्न धर्मों की समरसता के सिद्धांत का अनुसरण किया. हाकिम खान सूर एक मुसलमान होते हुए भी राणा प्रताप की सेना का हिस्सा थे जो भारतीय संस्कृति की रक्षा कर रही थी! फिर राजा मानसिंह, जो अकबर की फौज का नेतृत्व कर रहे थे, किसकी रक्षा कर रहे थे? इतिहास की संघी विवेचना के अनुसार, राणा प्रताप और शिवाजी हिन्दू राष्ट्रवाद के हीरो हैं. शायद अब उन्हें यह पता चला है कि इन दोनों राजाओं की फौज में मुसलमान थे और उनके प्रतिद्वंद्वी मुस्लिम राजाओं की फौज में हिन्दू योद्धा थे. सच पूछा जाए तो उनके बीच हुए युद्धों का भारतीय संस्कृति की रक्षा से कोई लेनादेना नहीं था. वास्तविकता तो यह है कि इस दौरान भारतीय संस्कृति खूब फली-फूली जिसका उल्लेख करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने उसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ बताया है (नेहरु के अनुसार यह दौर बहुलता एवं समन्वय का शिखर था). इस दरम्यान भक्ति और सूफी परंपराओं की जड़ें मजबूत हुईं. ये दोनों परंपराएं जीवन के मानवीय मूल्यों पर जोर देती हैं. जहां तक राम मंदिर को राष्ट्रीय मूल्यों और संस्कृति का प्रतीक बताए जाने का सवाल है, हमें डॉ भीमराव अम्बेडकर की ‘रिडल्स ऑफ़ राम एंड कृष्ण’ को याद करना चाहिए. शूद्र शंबूक की हत्या तब करने जब वह तपस्या कर रहा था, बाली को छिप कर मारने और अपनी गर्भवती पत्नी को सिर्फ संदेह के आधार पर घर से निकलने के लिए पेरियार ने राम की जबरदस्त आलोचना की है. भारतीय राष्ट्रवाद के वास्तविक प्रतीक आजादी का आंदोलन और भारतीय संविधान हैं. भारतीय संविधान धर्म, जाति, क्षेत्र एवं भाषा के भेद के बिना सभी को समान नागरिक अधिकार देता है. असली समस्या यह है कि साम्प्रदायिक चिंतन के अनुसार भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और ईसाई व मुसलमान विदेशी हैं. आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक गोलवलकर अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ़ थाट्स’ में इन्हें देश का आंतरिक शत्रु मानते हैं. यह कहना कि भारतीय मुसलमान, हिन्दुओं के कारण दुनिया में सर्वाधिक प्रसन्न और संतुष्ट हैं, मजाक के अलावा और कुछ नहीं है. दिन-प्रतिदिन उनके विरूद्ध बढ़ती हिंसा, उनका अपने मोहल्लों में सिमटते जाना और उनके राजनैतिक प्रतिनिधित्व में सतत कमी दूसरी ही कहानी कहते हैं. इस सबके चलते मीडिया का एक हिस्सा मुस्लिम समुदाय को कोरोना जेहाद करने वाला कोरोना बम बताता है और इसी तारतम्य में सुदर्शन चैनल सिविल सर्विसेज में उनके चार प्रतिशत प्रतिनिधित्व को जामिया जिहाद और भारत की सिविल सर्विस पर कब्जा जमाने का षड़यंत्र बताता है! भारतीय मुसलमानों को दुनिया में सबसे सुखी और संतुष्ट बताना मुसीबतों से घिरे इस समुदाय के घावों पर नमक रगड़ने जैसा है. यह समुदाय संवैधानिक मूल्यों के आधार पर अपने जीवन जीने का प्रयास कर रहा है, जैसा कि शाहीन बाग आन्दोलन से जाहिर है. (हिंदी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)

October 15, 2020

India: Communalists, Indian Constitution and Muslim Minority

India: Communalists, Indian Constitution and Muslim Minorities Ram Puniyani A Year ago, RSS Chief Mohan Bhagwat had stated (October 10, 2019) that Indian Muslims are happiest in the World due to Hindus. Now he goes on to say that most content Muslims are only in India. Not content with that he went on to state that “if there is any example world over wherein a foreign religion that ruled over the people of a country still exists there”, it is here in India. And further “"Our Constitution did not say that only Hindus can stay here; hereafter only Hindus will be heard here; if you want to stay here, then you have to accept the superiority of Hindus. We created a space for them. This is the nature of our nation, and that inherent nature is called Hindu". Wearing the hat of a historian he stated that many a Muslims fought for Rana Pratap against Akbar, exemplifying that people of all faiths stood together whenever there was an attack on India’s culture. He labeled Ram Temple is a symbol of national values and character. Most of these formulations are a ploy to deflect the criticism which RSS, as the patriarch of Hindu Communalism is facing currently, at home and also internationally. The plight of Muslims has been deteriorating at rapid pace during last few decades. Adding on to the violence against them in the wake of Rath yatras for Ram Temple, the mob lynching’s in the name of cow-beef, the social intimidations in the name of love jihad, ghar Wapasi have peaked during last few years. The cumulative intimidation of Muslim community did find its expression in the most democratic Shaheen bagh movement. The violence that took place in the aftermath saw the heavy loss of Muslim lives and great damage to their properties and holy places. The image of communalism as tormentor of weaker sections of society is going up, so probably Mr. Bhagwat is quoting Indian Constitution, which most leaders from his Parivar decry, criticize and call it as being unsuitable for India as it is based on foreign values. On the contrary Shaheen bagh movement showed the peak respect for the same when ‘Preamble of Indian Constitution’ formed its core slogan and ideology. Undoubtedly, Indian Constitution wants a plural democratic India while RSS parivar wants a Hindu nation. For Indian Constitution religions are not foreign or native, they are universal and we have a full freedom to practice, preach and propagate our religion, we also have a freedom not to adhere to any religion. The RSS Sarsanghchalak probably does not know that nationalism and religion were separate in the scheme of freedom movement of India where people from different religions and atheists participated with equal zest in fighting against the British rule. He may be unaware that in South East Asian countries the major religion is Buddhism, which originated in this land but is the major religion in those countries. The communal view of History has been the mainstay of his organization, rather his Parivar’s politics. When he says that even Muslims participated in battle against Akbar, to save the Indian culture, he is taking the distortion of History to further level. In what way did Rana Pratap represent Indian culture? He was a King of Mewar. In what way the battle between Akbar and Rana Pratap was for Indian culture. Akbar, for that matter most of the Muslim kings, who ruled here, became the part of this land. Akbar in particular was for multi-faith society, that’s why he conceptualized Sulh-E-Kul (Harmony among religions). And as Muslim Hakim Khan Sur was part of Rana Pratap’s army (saving Indian culture!), so was Raja Mansingh leading the forces of Akbar! Quiet a garbled up exercise to project Rana Pratap as symbolizing Indian culture, forgetting Raja Mansing was leading forces from opposite side. So far RSS history has been presenting Rana Pratap and Shivaji as heroes of Hindu nationalism, now probably they have learnt that both these warriors had Muslims in their army and similarly their rival Muslim Kings had Hindus also on their side. These battles have nothing to do as being for and against Indian culture. As such Indian culture flourished during this period leading Jawaharlal Nehru to call this as ‘Ganga Jamani Tehjeeb’ (Syncretism, pluralism at peak). The peak of this was Bhakti and Sufi traditions, which focused on humane aspects of life. As far as Ram Temple being the symbol of national values and culture, we should recall Bhimrao Ambedkar’s ‘Riddles of Rama and Krishna’, where Ambedkar and later Periyar criticize the Lord for killing a Shudra Shambuk, when he was doing penance, killed Bali from behind and banished his pregnant wife Sita on mere suspicion. Symbol of Indian nationalism is freedom movement and Indian Constitution. Indian Constitution gives equal citizenship rights to people of all religions, ethnicities, regions and languages. The problem is that communalism regards this as a Hindu nation and so Muslims and Christians are regarded as foreigners. Accordingly earlier Sarsanghchalak M.S. Golwalkar in his book, ‘Bunch of thoughts’; calls them internal threat to the nation. To call that Indian Muslims are happiest in the World due to Hindus or they are most content in the World, must a joke. In the light of the rising violence against them, the rising ghettoisation of the community and their declining political representation tells another tale. To cap it; now a section of media, which is part of the communal project, is coining words like Corona Jihad, Corona bomb and the last in the series is from Sudarshan Channel, which sees four odd percent successful Muslim candidates as Jamia Jihadis and others with them as a part of planned jihad to take over civil services! Such statements like Indian Muslims are most content or happiest is like rubbing salt on the wounds of a besieged community, which is trying its best to live the values of Indian Constitution as witnessed during Shaheen bagh movement.

October 09, 2020

Hindi Article-Gandhi: Godse-Contrasting Nationalism

गाँधी और गोडसे: विरोधाभासी राष्ट्रवाद -राम पुनियानी इस वर्ष गांधी जयंती (2 अक्टूबर 2020) पर ट्विटर पर ‘नाथूराम गोडसे जिन्दाबाद‘ के संदेशों का सैलाब आ गया और इसने इसी प्लेटफार्म पर गांधीजी को दी गई श्रद्धांजलियों को पीछे छोड़ दिया. इस वर्ष गोडसे पर एक लाख से ज्यादा ट्वीट किए गए जबकि पिछले वर्ष इनकी संख्या करीब बीस हजार थी. इस वर्ष बहुसंख्यक ट्वीट, बाट एकाउंटस से भेजे गए. इन्हीं बाट्स से पिछले कुछ हफ्तों से ‘जस्टिस फॉर सुशात’ के संदेश भेजे जा रहे थे. इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ वर्षों से गोडसे को कुछ ज्यादा ही याद किया जा रहा है. यहां उल्लेखनीय है कि तत्कालीन आरएसएस प्रमुख राजेन्द्र सिंह ने कहा था, “गोडसे अखंड भारत का सपना देखता था. उसका इरादा नेक था परंतु जो रास्ता उसने अपनाया वह उचित नहीं था” (अप्रैल 27, 1998 आउटलुक). यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने संसद में कहा था कि, “नाथूराम गोडसे देशभक्त था, है और रहेगा”. इसी तरह, भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने गोडसे को राष्ट्रवादी बताया था. गोडसे को समर्पित एक मंदिर की नींव 2014 में मेरठ में रखी गई थी. कुछ वर्षों पहले ‘मी नाथूराम बोलतोय‘ नाटक का महाराष्ट्र में मंचन हुआ था जिसे देखने भारी संख्या में लोग आते थे. पिछले वर्ष 30 जनवरी को हिन्दू महासभा के कार्यकताओं ने गांधीजी की हत्या के दृश्य का मंचन किया था जिसके दौरान महासभा की पूजा शकुन पांडे ने गांधीजी के पुतले पर तीन बार गोली दागी. गोली लगते ही पुतले से खून बहने लगा और इसके तुरंत बाद दर्शकों को मिठाई बांटी गई. पिछले दिनों अनेक ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिनसे ऐसा प्रतीत होता है कि गांधीजी को राष्ट्रपिता मानने वाले देश में उनके हत्यारे के हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रभाव बढ रहा है. यह तब जब कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ने गांधीजी के सिद्धांतों को सम्मान देते हुए 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस घोषित किया है. गोडसे के विचारों का प्रचार उस समय किया जा रहा है जब सारी दुनिया में शांति और अहिंसा को समर्पित संस्थाएं स्थापित हो रही हैं. कई विश्वविख्यात नेताओं जैसे मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उनके आंदोलन गांधीजी से प्रेरित थे. यहां यह स्मरणीय है कि नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद पर आधारित शासन व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंका था. हमारे देश को भारतीय पहचान के आधार पर एक सूत्र में बांधना गांधी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान था. गांधी ने अपने साम्राज्यवाद एवं ब्रिटेन विरोधी आंदोलन में अहिंसा और सत्याग्रह के अपने सिद्धांतों का उपयोग किया. अपने आंदोलन के सिद्धांतों के विकास की प्रक्रिया में नस्ल और जाति की अपनी समझ के आधार पर उन्होंने सबकी समानता के सिद्धांत को प्रतिपादित किया. उनके इस चिंतन ने उस समय ठोस स्वरूप लिया जब उन्होंने छुआछूत विरोधी आंदोलन और दलितों के लिए आरक्षण का समर्थन किया तथा संविधान का प्रारूप बनाने वाली समिति की अध्यक्षता के लिए डा. अम्बेडकर का नाम प्रस्तावित किया. इसके ठीक विपरीत, मुस्लिम और हिन्दू राष्ट्रवादी अपने-अपने समुदायों के संपन्न वर्ग के हितों के लंबरदार बने रहे और उन्होंने वर्ग, जाति और लिंग के प्राचीन पदक्रम को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया. नाथूराम गोडसे, जो आरएसएस का प्रचारक था, हिन्दू राष्ट्रवाद के मूल्यों में आस्था रखता था. स्पष्ट है कि प्राचीन मूल्यों से प्रेरित हिन्दू राष्ट्रवादियों के भारत का मुख्य आधार असमानता थी. “मैंने गांधी की हत्या क्यों की” नामक पुस्तक, जो गोडसे के अदालत में दिए गए बयानों का संग्रह है, किताबों की दुकानों पर बड़े पैमाने पर उपलब्ध करवाई जा रही है. यह किताब देश के अतीत और आजादी के आंदोलन को साम्प्रदायिक चश्में से देखती है. किताब में गोडसे कहता है, “गांधी का व्यक्तित्व विरोधाभासी था. वे आक्रामक शांतिवादी थे, जिन्होंने सत्य और अहिंसा के नाम पर देश पर कई विपत्तियां लादीं. वहीं दूसरी ओर राणा प्रताप, शिवाजी और गुरू गोविंद सिंह, आजादी के लिए उनके योगदान के कारण देशवासियों के मन में हमेशा बसे रहेंगे. पिछले 32 वर्षों के घटनाक्रम, जिसकी पराकाष्ठा गांधीजी के मुस्लिम समर्थक अनशन से हुई, ने मुझे इस नतीजे पर पहुंचने पर मजबूर किया कि गांधी का तुरंत खात्मा किया जाए.” “उनके अनुयायी यह समझ ही न सके कि शिवाजी, राणा प्रताप और गुरू गोविंद सिंह के सामने गांधी बौने हैं और इसी कारण मैंने उनकी हत्या की. मेरी यह मान्यता है कि देश की आजादी के आंदोलन में गांधीजी का योगदान लगभग शून्य है”. गोडसे की इस विचारधारा के ठीक विपरीत, गांधी, भारतीय इतिहास को विभिन्न धर्मों के मानने वालों का इतिहास मानते थे. महात्मा गांधी ने कहा था कि, “मुस्लिम राजाओं के शासन में हिन्दू और हिन्दुओं के शासनकाल में मुसलमान, फले-फूले. दोनों ने महसूस किया कि परस्पर वैमनस्य आत्मघाती है और दोनों को यह पता था कि तलवार की नोंक पर दूसरे को उसका धर्म त्यागने के लिए बाध्य करना संभव नहीं होगा. दोनों ने शांतिपूर्वक साथ रहने का निर्णय किया. अंग्रेजों के आने के बाद झगड़े प्रारंभ हो गए...”(हिन्द स्वराज). यह अफसोस की बात है कि हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायवादी, देश को लूटने में साम्राज्यवादियों की भूमिका, समानता के लिए सामाजिक परिवर्तन और देश को आजाद करने के लिए साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के महत्व को नहीं समझते. आज हमारे देश में विरोधाभासी प्रक्रियाओं का प्रभाव नजर आ रहा है. जहां पूरी दुनिया में सामाजिक आंदोलन, अहिंसा और सत्याग्रह के संबंध में गांधी के विचारों के महत्व को महसूस किया जा रहा है वहीं भारत में राष्ट्रवाद के बारे में गांधी के नजरिए की उपेक्षा हो रही है. आज के शासक जहां एक ओर गांधी को राजघाट पर फूल चढ़ाकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर वे ऐसी विचारधारा को प्रोत्साहन दे रहे हैं जो गांधीजी की हत्या की जड़ में थी. एक ओर ट्विटर के जरिए योजनाबद्ध तरीके से गोडसे के विचारों का प्रचार किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर आरएसएस, जो गोडसे की विचारधारा का मूल स्त्रोत था और जिसका वह प्रचारक था, से दूरी बनाने का प्रयास कर रहा है. अभी तक हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा पर्दे के पीछे थी परंतु अब खुल्लम-खुल्ला गोडसे की स्तुति की जा रही है. आज के समय में सत्ताधारियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से गोडसे की विचाराधारा को स्थापित किया जा रहा है. दूसरी ओर हिन्दुत्व के नाम पर गांधी के महत्व को कम किया जा रहा है. यह हिन्दुत्व न तो संतों की परंपरा का है और ना गांधी की. ऐसा लग रहा है कि गोडसे के भारत के सामने गांधी का भारत कमजोर पड़ रहा है. गांधी का भारत एकता, समावेशिता, स्नेह और करूणा पर आधारित है. आज के सत्ताधारियों द्वारा इन मूल्यों की अवहेलना की जा रही है. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

October 06, 2020

Conversions and Anti Christian Violence: Pastor Stains

Conversions and Anti Christian Violence in India Ram Puniyani Mr. Satyapal Singh, the BJP MP, while speaking in Lok Sabha on amendments to FCRA went on to support the forthcoming restrictions to the foreign contributions. While making his arguments, to buttress his point, he put forward the case of Pastor Graham Stewart Stains. In the process he poured venom on the late Pastor by saying that the Pastor had raped 30 Tribal women and was involved in the work of conversion to Christianity with the help of funds from abroad! This blatant lie should have been countered in the Parliament. The brutal murder of Pastor Stains was described by the then President of India, Dr. K.R. Narayanan by saying “it belonged to the world’s inventory of black deeds”. The pastor, who came from Australia to work among the Leprosy patients in Orissa, was sleeping in an open jeep in the village on the night of 22-23 January 1999. He was working in Keonjhar, Manoharpur, in Orissa. On that fateful night he was burnt alive with his two minor sons, Timothy and Philip. The Whole Country was aghast with the brutal nature of the crime. The brutality was committed by Rajendra Singh Pal aka Dara Singh, a worker of Bajrang Dal. Mr. Advani was the home minister that time. He stated that Bajrang Dal has nothing to do with this act; he knows this organization too well. As the immediate measure he sent three member ministerial team, Murli Manohar Joshi, Navin Patnayak and George Fernandez to Orissa. In a single day the team concluded that this grave crime is an international conspiracy to destabilize the ruling NDA government. Then Wadhava Commission was appointed. The commission concluded that Dara Singh, who was working with Bajrang Dal with the help of organizations like Vanvasi Kalyan Ashram, VHP etc. propagated that Pastor is doing the work of conversion and is a threat to Hinduism. He did mobilize people, poured Kerosene on the vehicle and put fire. The Commission in its report further stated that Pastor had not been doing the work of conversion; he was involved in serving the leprosy patients. Dara Singh was awarded death penalty by Courts, which was later reduced to life imprisonment; currently he is undergoing the jail sentence. What is remarkable is that as per the report there was no substantial increase in the percentage of Christians in the area. The report states, “Keonjar district had a total population of 15.30 lakh. Out of them, 14.93 lakh were Hindus. Christians, mostly tribal’s, were 4,707. According to the 1991 census, there were already 4,112 Christians in the district. Thus, there was an increase of only 595 in the Christian population.” One can say that this is not due to conversion but is due to the natural biological process. Propaganda of Dara Singh and the organizations was purely guided by their political agenda. The propaganda that Christian missionaries have been converting is the dominant social perception all around, and it is the ground for ‘Hatred against the Christians’, who have been facing the violence from last over two decades. We witnessed violence against Christians, mainly in Adivasi areas, Dangs, Jhabua, and large parts of Orissa. After this gruesome murder, there was regular violence against Christian community, the peak of which was seen in the Kandhamal violence (August 2008) in which nearly hundred Christians were killed, close to four hundred women raped and many Churches attacked and destroyed. That has not been the end. The violence against this community is going on in a regular manner. It is mostly in remote areas, in a scattered manner and many a times below radar. The prayer meetings are attacked and missionaries distributing religious literature are apprehended. The organization ‘Persecution Relief’, in its recent report points out, “Hate crimes against Christians in India have risen by an alarming 40.87 percent...,That increase came despite a complete nationwide lockdown that lasted three months to stem the spread of Covid-19 infections.” While the attacks on Muslim minority has been glaring, those against Christians though are scattered and low intensity, the murder of Pastor Stains and Kandhamal violence stand out. The core ideology behind this violence which has been spread is that Islam and Christianity are ‘foreign religions’ and are a threat to Hinduism. This is so much in contrast to what Indian Nationalists like Gandhi and Nehru who regarded that religion is no basis of Nationality; Christianity is as much a religion of this land as any other. As a matter of fact as per one version Christianity entered this land in AD 52, With St Thomas setting up Church in Malabar area. Since close to last over 19 Centuries many missionereris have been coming and working in the remote areas, setting up health and education facilities in particular. They have also set up the schools and colleges, and hospitals in urban areas, which are known for their good standards, and people in these areas do vie to avail of these facilities with gay abandon. Today the percentage of Christians, as per census figures is 2.30 (2011 census), this is again a climb down from 1971 when it was 2.60 %. Last six decades it has shown a constant decline, 2.60 (1971), 2.44 (1981) 2.34 (1991), 2.30 (2001) and 2.30 again in 2011. The organizations like Vanvasi Kalyan Ashram, VHP and Bajrang dal are active more in remote places to spread the misconception of the conversion. This is an assault on ‘Freedom of Religion’ and the repressive laws against freedom of religion have been coming up in state after state. While Indian Constitution stands for individual’s right to practice and preach one’s religion, the anti Christian violence on the pretext of religion is becoming endemic as sectarianism is growing in a frightening manner. Recently 25th August, it was 12 years since kandhamal Violence had shaken the country. The need is to restore peace, amity and harmony. By speaking unsubstantiated charges Mr. Satyapal Singh has just gone on to add to the anti Christian propaganda, which dents our values of Fraternity.