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September 25, 2020

Hindi Article- Was Mughal Rule a period of Slavery?

क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? -राम पुनियानी जब जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भारतीय इतिहास को हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजित किया, उसी समय उन्होंने अंग्रेजों को ‘फूट डालो और राज करो’ की उनकी नीति को लागू करने का मजबूत हथियार दे दिया था. परंतु इसके साथ ही उन्होंने भविष्य में साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों को भी लोगों को बांटने की एक रणनीति दे दी थी. आगे चलकर मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्वों ने यह दावा करना प्रारंभ कर दिया कि भारत पर उनका राज था. इसी तरह, साम्प्रदायिक हिन्दुओं ने भी यह कहना प्रारंभ कर दिया कि मुसलमान तो विदेशी हैं और भारत तो अनंतकाल से हिन्दुओं का देश रहा है. भारतीयों के मानस में यह सोच कितने गहरे तक घुस चुकी है इसका सबूत है उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह घोषणा कि आगरा में बनने वाले मुगल संग्रहालय का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय रखा जाएगा. उनका तर्क है कि यदि संग्रहालय का नाम मुगल संग्रहालय होगा तो यह हमारी गुलामी का प्रतीक होगा. मुगल संग्रहालय की नींव उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रखी थी. यह संग्रहालय आगरा में ताजमहल के पास बन रहा है जिसमें उस समय की संस्कृति और मुगल राजाओं के हथियारों का प्रदर्शन होगा. उत्तरप्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देना इस संग्रहालय के निर्माण का मुख्य लक्ष्य था. हिन्दू सम्प्रदावादियों द्वारा ताजमहल के महत्व को कम करने का प्रयास किया जा रहा है. पी. एन. ओक नामक एक सज्जन इसे तेजोमहालय (शिव मंदिर) बताते हैं जिसे बाद में शाहजहां ने मकबरा बना दिया. फ्रांसीसी जौहरी टेवर्नेअर और चीनी पर्यटक हेन सांग ने अपने यात्रा संस्मरणों में लिखा है कि शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनाया था. इसी तरह, शाहजहां के दरबार की बहियों में ताजमहल पर हुए खर्च का विस्तृत विवरण दिया गया है. यह भी बताया गया है कि जिस जमीन पर ताजमहल बनाया गया है उसका मुआवजा राजा जयसिंह को देकर उसे खरीदा गया था. जब योगी ने उत्तरप्रदेश की सत्ता संभाली तब उन्होंने ताजमहल को उत्तरप्रदेश के महत्वपूर्ण स्थलों की सूची से हटा दिया था. योगी के हालिया कथन कि मुगलों को याद करना हमारी गुलामी की प्रवृत्ति का प्रतीक है, उस साम्प्रदायिक विचारधारा के अनुरूप है जो मानती है कि इस्लाम एक विदेशी धर्म है और मुसलमान विदेशी हैं. दरअसल भारतीय इतिहास को देखने के तीन नजरिये हैं. पहला, गांधी-नेहरू नजरिया, जिसके अनुसार भारतवर्ष समृद्ध विविधता वाला मुल्क है और जिन मुस्लिम राजाओं ने भारत पर शासन किया वे भारत को अपना मानते थे. बहुसंख्यक मुस्लिम राजाओं ने भारत की बहुवादी धार्मिक परंपरा का सम्मान किया. महात्मा गांधी ने कहा था कि, “मुस्लिम राजाओं के शासन में हिन्दू और हिन्दुओं के शासनकाल में मुसलमान फले-फूले. दोनों ने यह महसूस किया कि परस्पर वैमनस्य आत्मघाती है और दोनों को यह पता था कि तलवार की नोंक पर दूसरे को उसका धर्म त्यागने के लिए बाध्य करना संभव नहीं होगा. दोनों ने शांतिपूर्वक रहने का निर्णय किया. अंग्रेजों के आने के बाद झगड़े प्रारंभ हो गए.” इसी तरह, जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘भारत एक खोज’ में हिन्दुओं और मुसलमानों के परस्पर सामंजस्य को ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ बताया है. जिसका अत्यधिक प्रभावी प्रस्तुतिकरण श्याम बेनेगल के टीवी धारवाहिक ‘भारत एक खोज’ में देखने को मिलता है. क्या वह युग जिसमें भारतवर्ष के अनेक हिस्सों पर मुस्लिम राजाओं ने शासन किया (जिनमें न सिर्फ मुगल वरन अन्य अनेक राजवंश, जिनमें गुलाम, खिलजी, गजनवी और दक्षिण में बहमनी शामिल थे) उसे गुलामी का काल कहा जाए? इसमें कोई संदेह नहीं कि महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी, चंगेज खान आदि कई राजा भारत को लूटकर वापिस चले गए वहीं ऐसे अन्य कई राजा थे जिन्होंने यहाँ शासन किया और यहीं के हो कर रह गए. निसंदेह उन्होंने भारत का शोषण किया परन्तु यह तो अधिकांश राजा करते हैं. परंतु इस युग को गुलामी का युग नहीं कहा जा सकता. असली गुलामी का काल तो अंग्रेजों के आने के बाद प्रारंभ हुआ जिन्होंने अपने शासन के दौरान लूटपाट की और किसानों का जम कर खून चूसा. शशि थरूर ने अपनी पुस्तक ‘एन इरा ऑफ डार्कनेस’ में बताया है कि जब अंग्रेज भारत आए थे उस समय भारत की जीडीपी, विश्व की जीडीपी का 23 प्रतिशत थी और जब वे भारत छोड़कर गए जब यह मात्र 3 प्रतिशत रह गई थी. ब्रिटिश राज का एक सकारात्मक पहलू भी है. अंग्रेजों के आने के पूर्व भारत के सामाजिक ढ़ांचे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था परंतु ब्रिटिश शासन के दौरान लोकतांत्रिक समाज और आधुनिक देश के निर्माण की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण पहलें हुईं जिनमें रेलवे, संचार सुविधाएं, आधुनिक शिक्षा, न्याय प्रणाली एवं लोकतांत्रिक संस्थाओें की स्थापना शामिल था. साम्प्रदायिक हिन्दू और मुस्लिम, अंग्रेजों की व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए देश के इतिहास को हिन्दुओं के मुसलमानों के बीच टकराव का इतिहास बताते हैं. दोनों अपने को इस धरती का मालिक और दूसरे के अत्याचारों का शिकार बताते हैं. दोनों अंग्रेजों द्वारा की गई लूटपाट को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हैं. दूसरी ओर, अम्बेडकर भारतीय इतिहास को बुद्ध धर्म द्वारा स्थापित सामाजिक बराबरी और ब्राम्हणवाद के बीच संघर्ष का इतिहास बताते हैं. सभी हिन्दू राजा महान नहीं थे और सभी मुस्लिम राजा क्रूर खलनायक नहीं थे. अकबर और दारा शिकोह बहुवाद के पैरोकार थे जिन्होंने सभी धर्मों की अच्छी बातों को स्वीकार किया और शिवाजी उन राजाओं में थे जिन्होंने गरीबों पर थोपे गए करों को कम किया. इस तरह आजाद भारत के असली हीरो वे हैं जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दिया. इसकी तीन प्रमुख धाराएं हैं - पहले हैं गांधीजी, जिन्होंने देश को अंग्रेजों के साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के माध्यम से एक सूत्र में पिरोया. दूसरे हैं अम्बेडकर जिन्होंने सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया. तीसरी धारा के प्रतिनिधि हैं भगत सिंह, जिन्होंने अंग्रेजी राज के विरूद्ध संघर्ष करते हुए गरीबों की दुर्दशा के प्रति जागरूकता फैलाई. सच पूछा जाए तो इन तीनों मूल्यों से ही आधुनिक भारत को प्रेरणा लेनी चाहिए ना कि राजशाही के मूल्यों से, जो बुनियादी रूप से सामाजिक असमानता और किसानों के शोषण पर आधारित था. हमें विविधता और समानता के सिद्धांतों को ही भविष्य के भारत के निर्माण का आधार बनाना चाहिए. सच पूछा जाए तो मुगल संग्रहालय हमारे बीते हुए दिनों के सांस्कृतिक स्वरूप को दिखाने का प्रयास है ना कि गुलामी का प्रतीक. दुर्भाग्य से हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब भारतीय संस्कृति को संपन्न बनाने में मुसलमानों के योगदान के सभी प्रतीकों को उखाड़ फेंकने का प्रयास हो रहा है है. इसी इरादे से इलाहबाद, फैजाबाद और मुगलसराय के नामों को बदला गया है. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

September 23, 2020

India: As long as the Hindu Right rules their gun weilding men will go scott free - '6 Acquitted in 2009 Goa blast case' [report in Hindustan Times, sept 19 2020]

The Hindustan Times Bombay HC upholds acquittal of 6 accused in 2009 Goa blast case All the accused were said to be related to a right-wing Hindu organisation, Sanatan Sanstha. india Updated: Sep 19, 2020 14:14 IST Gerard de Souza | Edited by Abhinav Sahay Hindustan Times, Panaji The Bombay high court at Goa has upheld the acquittal of the six persons charged with procuring, assembling and transporting a bomb to Margao in South Goa, where it prematurely exploded killing two persons who were allegedly ferrying it on the eve of Diwali in 2009. The two deceased -- Malgonda Patil and Yogesh Naik -- were allegedly carrying the bomb in their scooter with the intent to place it at a site where a Diwali eve competition was being held on October 16, 2009. Besides Patil and Naik, who died while ferrying the bomb, no one else was injured in the blast that took place behind Grace Church in Margao. Besides Patil and Naik, six others were charged by the NIA including Vinay Talekar, Dhananjay Ashtekar, Prashant Ashtekar, Vinayak Patil, Prashant Juvekar and Dilip Mazgaonkar, all hailing from Maharashtra and with connections to the Sanatan Sanstha. They were charged by the Goa Police crime branch. The case was later handed over to the National Investigation Agency. [ . . .] https://www.hindustantimes.com/india-news/bombay-hc-upholds-acquittal-of-6-accused-in-2009-goa-blast-case/story-bNKm7El2zWABx22VpmLu7K.html

September 22, 2020

India : Letter to State Election Commissioner, Telangana state regarding Incident of 7 Dec 2018 - when MIM MLA warned officials about verifying veiled women's facial identity

 

Hyderabad  22 sep 2020

To
The State Election Commissioner
Telangana state
Hyderabad


Sub:  7 december 2018 election day - telangana assembly - What happened when contesting candidate from karwan assembly asked the officials at Polling Station-75, Karwan AC, to comply with rule and check veiled women's photo electoral identity by a women officer as laid down in the election rules?



With reference to above news item, it is mandatory as per election rules, that veiled women's photo identity should be checked by a female officer so that the choice of women to cast their franchise with a veil as well as the mandatory exercise of establishing the genuinity of any voter by checking with photo electoral rolls as well as the photo identity card and the facial identity is thoroughly undertaken. 

As such citizens who believe in free and fair electoral process should not have objections to avail of the facility of women election officials verifying veiled women's facial identity to comply with the laid down rules.

But contrarily, on 7th december 2018 on election day of telangana assembly, the MIM MLA from karwan Janab kausar mohiddin, brazenly violated election rules, and had stormed into the polling booth PS-75 along with more than dozen unauthorized people and warned the officials against any checking, questioned the co-contesting candidate what rules and who are you.  further, one of the unauthorized persons warned the candidate against speaking for rules.

Upon continuous petitions from the contested candidate  to Chief Electoral Officer, Telangana, from 7 december 2018 onwards, the DGP Telangana office and Hyderabad Police Commissioner office had submitted two inquiry reports to the CEO, Telangana.

Both the reports that are attached herewith for reader's perusal, are received from CEO Telangana dated 4 april 2019 and 30 march 2019 containing from DGP office and Hyderabad Commissioner office inquiries, respectively.

As per Hyderabad Police Commissioner inquiry report,The illegality and grave violation of unauthorized entry is documented as:

'sri Kauser Mohiuddin, AIMIM party, a contested candidate and current MLA of Karwan Constituency entered the PS No.75 at about 1030 hrs along with the group of about L0 people.' 

Whereas, the threats to election officials, contested candidate upon asking for implementation of verification of veiled women's photo identity, has been documented as :

'Both Dr. Lubna Sarwath and Sri kauser Mohiuddin had discussion among themselves and with the presiding officer about the poll process for about a minute and sri Kauser Mohiuddin and others left the place. One person from the group while leaving had a brief discussion with Dr. Lubna Sarwath on poll process,'

Further, the DGP Inquiry report documented as follows:

'The petitioner aLleged that on 07-12-2018, while she was informing the presiding officer on the discrepancies of non checking of the identitY of the veited women, despite the APO is a woman officer, Sri Kauser Mohiuddin, the then-MLA Candidate and now MLA, Karwan ConstituencY from AIMIM PartY, had barged into Polling station-75 along with group of people and threatened the presiding officer and then threatened petitioner also.  Similarly sri Kausar Mohiuddin, MLA warned the presiding officer  not to stop any women from voting and not to check any women by removing their veil and checking their identity.  He then questioned the petitioner, who she was and threatened her not to quote any rules and then he left.
One of the persons in his gang told the petitioner that it will not be good, if she keeps quoting rules'


Further, the inquiry is documented as follows:

'1) Presiding officer:- sri renneti Bharani Kumar ASo, (panchayath Raj Department, Tetangana State Secretariat) of p.S.No.75, stated that on election day i.e., 07-12-2018 at about 10.30 AM, petitioner entered into potting station and enquired about polling arrangements and atso checking the process of Mustim community women voters. He explained the petitioner that they will follow the guidelines issued by ECl. After some time, other contested candidate of Karwan Assembly constituency by name Mr- Kauser Mohiuddin, AIMIM party also entered inside the polling station atong with a group of about 10 people, to enquire about polling process. He also explained the polling process to Mr. Kauser Mohiuddin and both the petitioner and Mr. Kauser Mohiuddin started discussion on the guidelines to be followed during polling process. This discussion took place for about a minute.  However, during that time as a
measure of peacefu[ conduct of potting, he directed one of his polling personnel to call the police assigned for law and order duties at ps No.75.'


Socialist Party(India) appeals to all political parties and citizens to comply with all election guidelines including the guidelines laid for facial verification of veiled women voters with their photo electoral rolls and photo identity cards.  SP(I) encourages discussion and consensus to comply with the rules in an amicable manner and exhorts desisting from breaking the rule.

Its every citizen's ethical duty to comply with every election rule, towards preservering the democracy of our country, at the heart of which lies the conduct of free and fair polls with an authentic and purified electoral rolls.

with upcoming GHMC elections, We trust State Election Commission ensures that no candidate would face the situation faced by dr lubna sarwath for trying to uphold fairness in voting, nor should polling be allowed in any polling station without the mandatory verification of voter with the photo electoral identification. 
We trust the SEC will lay down explicitly the strict action that awaits candidates and citizens who do not comply with this rule and those who stop from compliance of the rule.


best
dr lubna sarwath
state general secy,
Socialist party (India)


India: Why Muslims join the Muslim wing of the RSS | Felix Pal (Contemporary South Asia -Volume 28, 2020 - Issue 3)

 Contemporary South Asia

Volume 28, 2020 - Issue 3

Why Muslims join the Muslim wing of the RSS

Pages 275-287 | Published online: 07 Jun 2020
 

The Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) – the paramilitary corps that animates the contemporary Indian Hindu nationalist movement – increasingly relies on its Muslim wing to bolster its denials of extremism. The RSS claims hold that crowds of Muslims join its Muslim wing, the Muslim Rashtriya Manch, through organic nationalist awakenings that imply tacit acceptance of the RSS’ Hindu nationalist agenda. Based on a year of interview-based research in North and West India with more than 80 Manch members, defectors, critics and leaders, I provide empirical evidence that challenges the claim that the RSS is winning over Muslim minds. Instead, I suggest that Muslims join for largely instrumental reasons; for material reward and security, but also to rebuke traditional Muslim centres of power and to draw close to the charismatic leadership of Manch leader Indresh Kumar. While discussions of motivations are famously fraught, I rely on interviews not to conclusively list membership motivations, but to assess the claims made by the RSS. As Hindu nationalists consolidate and intensify their activities after the 2019 general election, understanding how the RSS does or does not ‘win over’ India’s Muslim communities is necessary groundwork to address the position of minorities in a Hindu nationalist future.

 

https://www.tandfonline.com/doi/abs/10.1080/09584935.2020.1776219

September 18, 2020

English Article: Kashi, Mathura: Will Temple Politics be revived?

Kashi- Mathura: Will Temple Politics be Revived? Ram Puniyani When Babri Mosque was being demolished in broad day light, the slogan being chanted by the leaders was, Yeh to Kewal jahnki hai, Kashi Mathura Baaki hai (This is the beginning, Kashi Mathura are next on the line). Supreme Court despite giving the same land to those who demolished the Mosque did call it a crime. The Ram Temple was used to the hilt for electoral purpose and for dividing the society along religious lines. The faith that ‘Lord Ram was born precisely at that spot’ was constructed. This constructed faith formed the base of politics and later the judgement of the Courts. Having achieved this milestone of religious nationalism, now what next? As such there is no dearth of divisive issues, issues based around identity, issues which demonise the religious minorities, marginalise them and give a boost to sectarian nationalism, some of these are permanently on the agenda like, love jihad, (added on by land jihad, corona jihad, civil service jihad etc.) holy cow, large families, Uniform Civil code among other. There is a regular addition to such issues, through which the majoritarian politics aims to show the majority community as the victim of minorities. In that sense the issue of Kashi and Mathura are potent issues, which can add on to the already existing plethora of identity issues. In Kashi, abutting the wall of Vishwanath Temple is Gyanwapi Mosque. Some say this was built at the time of Akbar and others say it was Aurangzeb during whose reign it was built. In Mathura, Shahi Idgah mosque stands next to Krishna janma Bhumi Temple. As per the section of Hindu belief the Holy Trio is Ram, Shiva and Krishna which are the most important deities. So the places of importance become Ram (Ayodhya), Shiva (Varanasi) and Krishna (Mathura) which are the three major places to be retrieved. While the current narrative being popularized is that scores of temples have been destroyed by the invading Muslim rulers of these at least three have to be retrieved as per Hindu Nationalists. There have also been talks and formulations floating that Jama Masjid in Delhi and Jama Masjid in Ahmadabad are also the places, which have been built on Hindu places of worship. The temple destructions have been dealt with by many scholars of History and Archaeology. Temples have been destroyed for political rivalry, assertion of one’s rule and for wealth. It is not only Muslim kings who destroyed Hindu temples, some of them gave generous donations to Hindu temples. Firmans of King Aurangzeb tell us of scores of temple where he gave donations, to recount just couple of them- Kamakhya Devi in Guwahati, Mahakal in Ujjain, and Lord Krishna in Vrindavan. He also destroyed a mosque in Golconda when the local ruler refused to give him the tribute for three consecutive years. D. D. Kosambi points out (Quoted in ‘Religious Nationalism’, Media House 2020, page 107) that Raja Harshdev of 11th Century Kashmir who appointed a special officer, Devottapatna Nayak, to uproot gold, silver and precious stones studded idols during his regime. Richard Eaton tells us about rival Hindu kings destroying the defeated opponents Kuldevata (Clan god) Temple to build temple of their own clan God. In Srirangatnam Maratha armies destroyed the Hindu temple and Tipu got it repaired! Somehow selective communal historiography has ensured the temple destruction becoming a major seed of divisive politics in India. If we go a bit further back into history the clash between Buddhism and Brahmanism led to destruction of thousands of Buddha Viharas. Recently while levelling the ground for Ram Temple ground breaking many remnants of Buddha Vihar were found. Historian Dr. M.S. Jayaprakash points out “Hundreds of Buddhist statues, stupas and viharas have been destroyed in India between 830 and 966 AD in the name of Hindu revivalism. Both literary and archaeological sources within and outside India speak volumes about the havoc done to Buddhism by Hindu fanatics… many Hindu kings and rulers took pride in demolishing Buddhist images aiming at the total eradication of Buddhist culture.” In this backdrop where do we go from here after we have seen the mayhem created around Lord Ram Temple in Ayodhya? The social and political fallout of the whole issue has pushed our democracy several steps backwards. It has relegated the religious minorities in to the cocoon of second class citizenship. As Akhil Bhartiya Akhada Parishad has declared that it will initiate the campaign for liberation of Kashi and Mathura, it has also said that in due course the arms of Sangh Parivar will be asked to join in. At the moment RSS is saying that it is not keen on the issue, but it seems it is a matter of time when it will jump into the Kashi-Mathura fray and deepen the impact of the campaign to be launched by Akhada Parishad. Already calling the mosques as two “symbols of slavery”, BJP leader and rural development and panchayat raj minister in Karnataka K.S. Eshwarappa had said on August 5 that “a symbol of slavery disturbs our attention and points out that you are a slave”. He reiterated his stance and said, “… All Hindus across the world have a dream that those symbols of slavery should be removed on the lines of Ayodhya. The masjids in Mathura and Kashi will be destroyed too and temples will be rebuilt.” As such legislation is in place which states, “prohibit conversion of any place of worship and to provide for the maintenance of the religious character of any place of worship as it existed on the 15th day of August 1947, and for matters connected therewith or incidental thereto.” Temple politics has dragged us into the politics, which is against plural, democratic ethos. The success of right wing forces to increase their clout through Ram Temple campaign may further, prompt them to go in this direction, which is detrimental to the progress and development of the country. The hope is that the majority people oppose such issues being rekindled again.

September 17, 2020

Hindi Article- Kashi: Mathura-Will Temple politics be revived?

काशी मथुराः मंदिर की राजनीति की वापसी -राम पुनियानी दिनदहाड़े बाबरी मस्जिद ध्वस्त किए जाते समय एक नारा बार-बार लगाया जा रहा था “यह तो केवल झांकी है, काषी मथुरा बाकी है”. सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद की भूमि उन्हीं लोगों को सौंपते हुए जिन्होंने उसे ध्वस्त किया था, यह कहा था कि वह एक गंभीर अपराध था. बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद राम मंदिर का उपयोग सत्ता पाने के लिए और समाज को धार्मिक आधार पर बांटने के लिए किया गया. बार-बार यह दावा किया गया कि भगवान राम ने ठीक उसी स्थान पर जन्म लिया था. यही आस्था राजनीति का आधार बन गई और अदालत के फैसले का भी. यह धार्मिक राष्ट्रवाद देश की राजनीति में मील का पत्थर बना. परंतु अब क्या? वैसे तो ऐसे मुद्दों की कोई कमी नहीं है जिनसे धार्मिक आधार पर समाज को बांटा जाता है और धार्मिक अल्पसंख्यकों को हाशिये पर लाने के लिए जिनका उपयोग होता है. इनमें से कुछ तो विघटनकारी राजनीति करने वालों के एजेंडे में स्थायी रूप से शामिल कर लिए गए हैं. जैसे, लव जिहाद (अब इसमें भूमि जिहाद, कोरोना जिहाद, सिविल सर्विसेस जिहाद आदि भी जुड़ गए हैं), पवित्र गाय, बड़ा परिवार, समान नागरिक संहिता आदि. इसके अलावा इस तरह के नए मुद्दे खोजकर भी सूची में जोड़े जाते हैं. इन मुद्दों को इस तरह पेश किया जाता है जैसे बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों की राजनीति से पीड़ित हैं. इसी इरादे से उठाए गए दो महत्वपूर्ण मुद्दे हैं काशी और मथुरा. काशी में विश्वनाथ मंदिर से सटी हुई ज्ञानव्यापी मस्जिद है. कुछ लोगों का कहना है कि यह मस्जिद अकबर के शासनकाल में बनाई गई थी तो कुछ अन्य मानते हैं कि इसका निर्माण औरंगजेब के राज में किया गया था. इसी तरह मथुरा के बारे में कहा जाता है कि शाही ईदगाह, कृष्ण जन्मभूमि के नजदीक बनी हुई है. हिन्दुओं की आस्था के अनुसार राम, शिव और कृष्ण सबसे प्रमुख देवता हैं. इस तरह धार्मिक दृष्टि से अयोध्या (राम), वाराणसी (शिव) और मथुरा (कृष्ण) आस्था के तीन केन्द्र हैं और इन्हें मुक्त कराना आवश्यक है. यह कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने सैकड़ों मंदिर ध्वस्त किए परंतु हिन्दू राष्ट्रवादियों के अनुसार कम से कम इन तीन को तो पुनः प्रतिष्ठापित किया ही जाना चाहिए. इसके अतिरिक्त यह भी प्रचारित किया जाता है कि दिल्ली की जामा मस्जिद और अहमदाबाद की जामा मस्जिद भी हिन्दुओं के पूजास्थलों को तोड़कर बनाईं गईं हैं. मंदिरों को ध्वस्त किए जाने की घटनाओं का इतिहास और पुरातत्व के विद्वानों ने विश्लेषण किया है. यह कहा जाता है कि मंदिर तोड़े जाने का प्रमुख कारण राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता थी. इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि अपनी सत्ता का सिक्का जमाने के लिए या संपत्ति हड़पने के लिए मंदिर तोड़े गए. एक पक्ष यह भी है कि जहां मुस्लिम राजाओं ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा वहीं उनमें से कुछ ने हिन्दू मंदिरों को उदारतापूर्वक दान भी दिया. ऐसे कुछ फरमान मिले हैं जिनमें इस बात का उल्लेख है कि औरंगजेब ने अनेक हिन्दू मंदिरों को दान दिया. इनमें गुवाहाटी का कामाख्या देवी मंदिर, उज्जैन का महाकाल और वृंदावन का कृष्ण मंदिर शामिल हैं. यह दावा भी किया जाता है कि औरंगजेब ने गोलकुंडा में एक मस्जिद को भी ध्वस्त किया क्योंकि गोलकुंडा का शासक तीन वर्षों से लगातार बादशाह को शुक्राना नहीं चुका रहा था. प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डी. डी. कोशाम्बी ने अपनी पुस्तक (रिलियजस नेशनलिज्म, मीडिया हाउस, 2020, पृष्ठ 107) में लिखा है कि 11वीं सदी में कश्मीर के राजा हर्षदेव ने दोवोत्वपतन नायक पदनाम के अधिकारी की नियुक्ति की थी. इस अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वह ऐसी मूर्तियों पर कब्जा करे जिनमें हीरे, मोती और कीमती पत्थर जड़े हों. एक अन्य प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता रिचर्ड ईटन बताते हैं कि विजयी हिन्दू राजा पराजित होने वाले राजाओें के कुलदेवता के मंदिरों को ध्वस्त करते थे और उनके स्थान पर अपने कुलदेवता के मंदिरों की स्थापना करते थे. श्रीरंगपट्टनम में मराठा फौजों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा और बाद में टीपू सुलतान ने उनकी मरम्मत करवाई. कुछ चुनिंदा साम्प्रदायिक इतिहासज्ञों ने मंदिरों के ध्वस्त होने की घटनाओं को देश में विभाजनकारी राजनीति को मजबूती देने के लिए प्रमुख हथियार बनाया है. इतिहास का एक पहलू यह भी है कि बौद्धों और हिन्दुओं के बीच टकराव में सैकड़ों बौद्धविहार तोड़े गए. अभी हाल में राममंदिर की नींव तैयार करने के दौरान बौद्धविहारों के अवषेष पाए गए. इतिहासवेत्ता डॉ एमएस जयप्रकाश के अनुसार, 830 और 966 ईसवी के बीच हिन्दू धर्म के पुनरूद्धार के इरादे से सैकड़ों की संख्या में बुद्ध की मूर्तियां, स्तूप और विहार नष्ट किए गए. भारतीय और विदेशी साहित्यिक और पुरातात्विक स्त्रोतों से यह पता लगता है कि हिन्दू अतिवादियों ने बौद्ध धर्म को नष्ट करने के लिए कितने क्रूर अत्याचार किए. अनेक हिन्दू शासकों को गर्व था कि उन्होंने बौद्ध धर्म और संस्कृति को पूर्ण रूप से तबाह करने में भूमिका अदा की. इस पृष्ठभूमि में हमारा आगे का रास्ता क्या होना चाहिए? हम अयोध्या के राम मंदिर को लेकर हुए उपद्रव को देख चुके हैं. इसके सामाजिक और राजनीतिक परिणामों ने हमारे लोकतंत्र को कई दशकों पीछे धकेल दिया है. नतीजे में धार्मिक अल्पसंख्यक लगभग दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए हैं. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने घोषणा की है कि वह शीघ्र ही काशी और मथुरा को मुक्त करने के लिए अभियान प्रारंभ करेगी परिषद ने यह इरादा भी जाहिर किया है कि इस अभियान में वह संघ से जुड़े संगठनों की सहायता भी लेगी इस समय तो आरएसएस यह कह रहा है कि इस मुद्दे में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है. परंतु जैसा पूर्व में हो चुका है, कि ज्योंही अखाड़ा परिषद का अभियान जोर पकड़ेगा संघ उससे जुड़ जाएगा. यहां यह उल्लेखनीय है कि मस्जिदों को गुलामी का प्रतीक बताया जाता है. कर्नाटक के भाजपा नेता और ग्रामीण विकास और पंचायत मंत्री के. एस. ईष्वरप्पा ने 5 अगस्त को यह दावा किया कि गुलामी के ये प्रतीक बराबर हमारा ध्यान खींचते हैं और हम से यह कहते हैं कि “तुम गुलाम हो”. उन्होंने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि “विश्व के सभी हिन्दुओं का एक स्वप्न है कि गुलामी के इन प्रतीकों को वैसे ही नष्ट किया जाए जैसे अयोध्या में किया गया था. मथुरा और काशी की मस्जिदों को निष्चित ही ध्वस्त किया जाएगा और वहां मंदिर का पुनर्निर्माण होगा”. ऐसी बातें इस तथ्य के बावजूद कही जा रही हैं कि इस संबंध में कानूनी स्थिति यह है कि “किसी भी धार्मिक स्थान में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं किया जाएगा जिससे उसके धार्मिक स्वरूप में परिवर्तन हो और उसमें वही स्थिति कायम रखी जाएगी जो 15 अगस्त 1947 को थी”. मंदिरों की यह राजनीति हमारे बहुवादी लोकतांत्रिक संस्कारों के विपरीत है. राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से दक्षिणपंथी ताकतें अपना प्रभुत्व बढ़ाने में सफल हुई हैं और इस सफलता से उत्साहित होकर वे इसे दुहराना चाहेंगीं जो देष की प्रगति एवं विकास में बाधक सिद्ध होगा. हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि बहुसंख्यक समुदाय ऐेसे मुद्दों को दुबारा उठाए जाने के खिलाफ उठ खड़ा होगा. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

September 11, 2020

Hindi Article- Islamophobia: Global Fallout

इस्लामोफोबिया और साम्प्रदायिकता के वैश्विक प्रभाव -राम पुनियानी पैगंबर हजरत मोहम्मद के बारे में आपत्तिजनक पोस्टों और कुरान की प्रतियां जलाने की प्रतिक्रिया स्वरूप अभी हाल में अनेक हिंसक घटनाएं हुई हैं. नवीन कुमार, जो बेंगलुरू के एक कांग्रेस विधायक के भतीजे हैं, ने फेसबुक पर पैगम्बर मोहम्मद के बारे में अत्यधिक आपत्तिजनक पोस्ट लिखी. इसके बाद मुस्लिम समुदाय का एक नेता, भीड़ के साथ नवीन के विरूद्ध थाने में शिकायत दर्ज कराने गया. पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी की. इस दरम्यान भीड़ बढ़ती गई और उसने तोड़फोड़ शुरू कर दी. पुलिस ने गोलियां चलाईं जिसके नतीजे में तीन लोगों की मौत हो गई. स्वीडन के मेल्मो शहर में अगस्त के अंत में एक दक्षिणपंथी नेता ने कुरान की प्रति को आग के हवाले कर दिया. यह भड़काऊ घटना ऐसी जगह हुई जहां मुस्लिम प्रवासी रहते हैं. ‘स्वीडन डेमोक्रेट्स’ नाम की नव-नाजीवादी पार्टी स्वीडन की संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. इस पार्टी का मानना है कि स्वीडन की सारी समस्याओं की जड़ वहां बसे शरणार्थी हैं. मेल्मो में लगभग तीन सौ लोगों की भीड़ ने कुरान के अपमान का विरोध करते हुए हिंसा की. स्वीडन की दक्षिणपंथी पार्टियों का आरोप है कि नार्डिक देशों का इस्लामीकरण किया जा रहा है और इन देशों में बढ़ते अपराधों के पीछे सीरिया के युद्ध के बाद वहां आए मुसलमान हैं. इसी बीच अनेक यूरोपीय देशों में भी दक्षिणपंथी ताकतों का दबदबा बढ़ रहा है. एएफजी (आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी) ऐसी ही एक दक्षिणपंथी पार्टी है. ऐसी सभी पार्टियों का वैचारिक आधार फासिज्म है. ये दल अति-राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं और प्रवासियों को निशाना बनाते हैं. प्रवासियों ने पश्चिम एशिया में युद्ध और हिंसा के कारण यूरोपीय देशों में शरण ली है. इस युद्ध और हिंसा का कारण है बढ़ती इस्लामिक कट्टरपंथी राजनीति. इस राजनीति को हवा दे रहे हैं अलकायदा, आईएसआईएस और आईएस. इन संगठनों को सशक्त किया है अमरीका की कट्टर इस्लाम को प्रोत्साहन देने की नीति ने. सच पूछा जाए तो तेल की लिप्सा इस इलाके में अमेरिकी हस्तक्षेप का मुख्य कारण है. एक अन्य घटना में ‘चार्ली हैबडो’ नामक फ्रांस की कार्टून पत्रिका ने पैगम्बर मोहम्मद से संबंधित कार्टूनों का पुनप्रर्काशन ऐसे समय किया जब उन आतंकवादियों पर मुकदमा शुरू हुआ था जिन्होंने सन् 2015 में इस पत्रिका के दफ्तर पर हमला किया था. उल्लेखनीय है कि पत्रिका ने जो कार्टून प्रकशित किए थे वे अनेक लोगों की नजर में अत्यधिक आपत्तिजनक थे. आतंकी हमले में पत्रिका के अनेक कार्टूनिस्ट मारे गए थे. इस घटना के अपराधी गिरफ्तार कर लिए गए थे और वे इस समय अदालत के सामने हैं. सन् 2007 में फ्रांस में उस समय एकाएक हिंसा भड़क उठी जब पुलिस ने दो मुस्लिम प्रवासी युवकों को मार डाला. यह घटना पुलिस द्वारा एक श्वेत नागरिक की हत्या की जांच के दौरान हुई. ये युवक गैर-कानूनी प्रवासी थे और इसलिए छिपकर रह रहे थे. उनकी हत्या के बाद फ्रांस में अनेक हिंसक घटनाएं हुईं. फ्रांस में रहने वाले अधिकांश प्रवासी मोरक्को, टयूनिशिया, माली, सेनेगल और अल्जीरिया समेत ऐसे देशों से आए हैं जो एक जमाने में फ्रेंच साम्राज्य का हिस्सा थे. ये सब 1950 और 1960 के दशकों में फ्रांस में बसे थे. ये सब मुस्लिम और अश्वेत हैं और पेरिस और फ्रांस के अन्य शहरों में अत्यधिक दयनीय स्थिति में रह रहे हैं. हमें बोको हरम द्वारा बच्चों के अपहरण और पाकिस्तान के पेशावर में तालिबानियों द्वारा बच्चों की हत्या जैसी अत्यधिक लोमहर्षक घटनाएं याद हैं. जिस तरह हमारे देश में मुसलमानों को उनके पिछड़ेपन और बड़े परिवारों के लिए दोषी ठहराया जाता है उसी तरह यूरोप में भी दक्षिणपंथियों का मानना है कि मुसलमान उन देशों की संस्कृति में घुलना-मिलना नहीं चाहते और अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं. कुछ दक्षिणपंथी अतिवादी नेता, आबादी के इस हिस्से को नीची निगाहों से देखते हैं और उन्हें कीड़े-मकोड़े, बर्बर और जाने क्या-क्या कहते हैं. हम आज एक ऐसे दौर में रह रहे हैं जिसमें धार्मिक पहचान अपना घिनौना चेहरा बेपर्दा कर रही है. पहचान की राजनीति के सबसे प्रमुख शिकार मुसलमान हैं. भारत में इस तरह की सोच का मुख्य स्त्रोत देश का विभाजन है जिसके चलते संपन्न मुसलमान पाकिस्तान चले गए और यहां बड़ी संख्या में गरीब और हाशिए पर पड़े मुसलमान रह गए. समय-समय पर होने वाली हिंसक घटनाओं के कारण उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती गई. और इसका एक असर यह हुआ कि वे अपने-अपने मोहल्लों में सिमट गए. यूरोप में इस्लामोफोबिया के दूसरे कारण हैं. पश्चिम एशिया में लगातार होने वाले युद्धों के कारण वहां के निवासी, शरणार्थियों की हैसियत से यूरोप के देषों में बस गए. स्वीडन उन देशों में है जिन्होंने इन शरणार्थियों को जगह दी. इनमें से बहुसंख्यकों को इसलिए कोई रोजगार नहीं मिल सका क्योंकि वे लगभग अशिक्षित थे. वे इन देशों में पूरी तरह सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर थे. इन्हीं मुद्दों को उठाकर नव-नाजी पार्टियां उन्हें निशाना बना रही हैं. पूरी दुनिया में इस्लामोफोबिया को हवा दे रही है अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां. अमेरिका की नीतियों ने जिस तरह की राजनीति को गढ़ा उससे दुनिया के एक बड़े हिस्से की नियति तय हुई. पाकिस्तान में मदरसों के माध्यम से अल्कायदा को प्रशिक्षित किया गया. इसके साथ ही तेल उत्पादक क्षेत्र में हिंसा के बीज बोये गए. कट्टर इस्लामवादियों को अमेरिका द्वारा प्रोत्साहन दिया गया. परंतु 9/11 के हमले ने सब कुछ बदल दिया. अमेरिका को यह अहसास हो गया कि उसने एक भस्मासुर को जन्म दे दिया है. इस हमले के बाद अमेरिकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़कर मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया. दुनिया के अनेक अन्य राष्ट्रों के मीडिया ने इस दुष्प्रचार को और हवा दी. हमारा देश भी इस मामले में पीछे नहीं रहा. अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति ने साम्प्रदायिकता के लिए उपजाऊ जमीन पहले ही तैयार कर दी थी. 21वीं सदी में अमेरिका की नीतियों कीर खाद-मिट्टी पाकर इस जमीन पर घृणा की फसल लहलहाने लगी. इस बीच जहां अनेक मुस्लिम देशों ने विभिन्न रास्तों से धर्मनिरपेक्षता की ओर कदम बढ़ाने शुरू किए वहीं दुनिया के तेल उत्पादक देश कट्टरवाद के चंगुल में फंसते गए. तुर्की, जो 1920 के आसपास से धर्मनिरपेक्षता का गढ़ बन गया था, वहां अब कट्टरवादी ताकतें मजबूत होती जा रही हैं. सूडान में राज्य और धर्म में कोई नाता नहीं रह गया है. इंडोनेशिया और मलेशिया दो ऐसे मुस्लिम बहुल राष्ट्र हैं जो कट्टरपंथी विचारधारा से दूरी बना रहे हैं. इसके विपरीत पश्चिम एशिया के देश अभी तक पोंगापंथ के जाल में फंसे हुए हैं. यह बहुत स्पष्ट है कि यदि भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के देशों में रहने वाले मुसलमान पिछड़ेपन का शिकार हैं तो उसका कारण इस्लाम नहीं है. उसका असली कारण दुनिया की बड़ी ताकतों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं है जो इस्लाम का सहारा लेकर अपने आर्थिक स्वार्थों को पूरा कर रही हैं. सच पूछा जाए तो मुसलमानों का वह हिस्सा जो अपनी धार्मिक पहचान को प्राथमिकता देता है, वास्तव में एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक चक्रव्यूह का शिकार है. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)